इच्छाओं के ना होने की इच्छा भी एक इच्छा ही तो है..
यह समझते-समझते मन कितनी ही इच्छाएँ और जोड़ लेता है।
चाहती हूँ कि कुछ न चाहूँ,
पर यह चाह मेरी हथेलियों में रेखाओं की तरह
अपने आप उभर आती है।
वैराग्य की सोच में अहंकार कहीं चुपचाप बैठ जाता है,
और शांति ढूँढते-ढूँढते मन खुद को और उलझा लेता है।
मन कहता है..सब छोड़ दूँ,
पर “छोड़ने” का यह भाव भी एक हल्की-सी
पकड़ बन जाता है।
शायद मुक्ति इच्छाओं को मिटाने में नहीं,
उनके आने-जाने को चुपचाप देखने में है।
न मिटाना,
न सजाना,
न खुद को दोष देना..
बस साक्षी बन जाना।
और जब इच्छा बिना बताए आती है
और बिना रोके चली जाती है,
तब मन में एक शून्य उपजता है,
जहाँ न चाह का आग्रह है, न त्याग का दिखावा,
केवल शांत, अचल ठहराव।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X