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यादों का सफर

                
                                                         
                            एक अनजान सफ में हम तुम मिले,
                                                                 
                            
दुनिया हँसी तो दिल में चाहत के गुल खिले।
वो धीरे-धीरे दोस्ती का रंग गहरा होना,
एक-दूजे की फिक्र में जागना और सोना।
तुम देती थी तोहफा मेरे जन्मदिन पर कभी,
मैं भी ले आता था तुम्हारे लिए सौगातें सभी।
इंतज़ार में कटता था वो रविवार का दिन,
धड़कनें अधूरी सी लगती थीं तुम्हारे बिन।
सोमवार को स्कूल सबसे पहले पहुँच जाना,
'सुप्रभात' और 'नमस्कार' के बहाने पास आना।
मिल जाता था जब भी कोई खाली घंटा वहाँ,
तुम्हारी बातों से गुलज़ार हो जाता था मेरा जहाँ।
जब भी होते उदास, तो फिक्र दोनों को होती थी,
तुम्हारी हँसी में ही मेरी हर ख़ुशी रोती थी।
तुम्हारा वो कहना कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ,
और मेरा सोचना कि मैं ज़िंदगी भर तुम्हारे पास हूँ।
ट्रेन के उस सफर में जब सब सो जाते थे,
हम चुपके से जागकर बातों में खो जाते थे।
तुम्हारा रूठ जाना और मेरा झट से मनाना,
सहलाकर तुम्हारा सिर, वो सारा ग़ुस्सा भुलाना।
आज गर्मियों की छुट्टियों में दूरी है मगर,
यादों में ठहर गया है वही पुराना सफर।
बैठा हूँ अपने घर पर लेकर तुम्हारा ही ख़्याल,
तुम बिन ये दूरियाँ, कर देती हैं बेहाल।
-विनोद सुल्तानपुरिया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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