ख्याल-ए-मयकशी से, ये दीवाना डर जाता है।
जब सैलाब-ए-अश्क से, पैमाना भर जाता है।।
रोज,सुबह-ओ-शाम समेटता हूँ वजूद अपना।
मगर फिर भी , क्यूं दफ़्फतन बिखर जाता है।।
उधर शम्मा जली,इधर ये दिल जलाया हमने।
अब हम देखेंगे, कि परवाना किधर जाता है।।
जख़्म गम-ए-हिज्र के,किसी तरह नही भरते।
ये मुद्दतों पुराना दर्द,कभी भी उभर जाता है।।
ऐश-ओ-इशरत के मोहताज हो गये हैं रिश्ते।
क्यूं बुरे वक्त मे, कोई ताल्लुक मर जाता है।।
दौर-ए-गर्दिश मे ना जा , यूँ छोड़कर मुझको।
बुरा वक्त भी तो,रफ्ता-रफ्ता गुजर जाता है।।
-यूनुस खान
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