बहुत साल पहले, बीसवीं सदी की शुरुवात में गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत की आज़ादी के संदर्भ में एक कविता (प्रार्थना) लिखी थी- ‘जहाँ मन भय मुक्त हो और सिर सम्मान से उठा हो’। (चित्त जेथ भोय शून्य – where the mind is without fear & the head is held high’)। यह एक स्वप्न था जो आने वाले समाज के लिए देखा गया था।
इस कविता के जिक्र के साथ ही मुझे किशोर दा का ये गीत भी याद आने लगता है - ‘आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ, एक ऐसे गगन के तले, जहां ग़म भी न हो...’। ये गाना 'दूर गगन की छाँव' फिल्म का है, जो 1964 में आई थी। यह फिल्म किशोर कुमार के प्रतिभा के विस्फोट का सबूत है।
आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ
इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक, संगीतकार और अभिनेता सभी की भूमिका में स्वयं किशोर कुमार हैं। ‘उड़..ले उड़ले…ओऊउ...’ या ‘धूम फटाफट .. धूम फटाफट’ छवि वाले किशोर कुमार अविश्वसनीय रूप से इस फिल्म में ग़मगीन और चिंतित स्वप्न द्रष्टा नज़र आते हैं। किशोर दा ने भी आने वाली पीढ़ी के लिए यह स्वप्न देखा था-
आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ
इक ऐसे गगन के तले
जहां ग़म भी न हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले
इक ऐसे गगन के तले
सूरज की पहली किरण से
सूरज की पहली किरण से
आशा का सवेरा जागे
चंदा की किरण से धुल कर,
घनघोर अंधेरा भागे
कभी धूप खिले कभी छाँव मिले
लंबी सी डगर न खले
जहां ग़म भी न हो, आँसू भी न हो .....
लेकिन किशोर दा और गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के स्वप्न के बीच एक बहुत बड़ी त्रासदी का यथार्थ है । यह यथार्थ है द्वितीय विश्व का, यह यथार्थ छः और नौ अगस्त 1945 के एटोमिक विस्फोट और मानवीय त्रासदी का है। किशोर दा के इस गाने पर 34 सालों के बाद (1998) आनंद पटवर्धन ने लगभग 5 मिनट की एक फिल्म (कैम्पेन- रिबन ऑफ पीस) बनाई। किशोर कुमार के उस गाने की इससे बेहतर और कोई टीका नहीं हो सकती है।
तस्वीर, जो किसी को भी विचलित कर सकती है
यह फिल्म भारत और पाकिस्तान के परस्पर परमाणु विस्फोट के बाद शांति आभियान के लिए बनाई गई थी। इस फिल्म के पहले ही दृश्य में जापान पर अणु बम गिराए जाने का फूटेज है। आसमान में उड़ता विमान, बम का गिरना और फिर सदी की सबसे विभीषक छवि – मशरूम के आकार का बादल। इसके बाद वहाँ के लोगों की विभत्स तस्वीर, जो किसी को भी विचलित कर सकती है।
बेटे का इलाज करवाना चाहता है
इस फिल्म में भी शंकर (किशोर कुमार) युद्ध से मेडल लेकर लौटा जवान है। वह अपने गांव अपने परिवार के पास लौटने पर पाता है कि उसका घर आग में जल कर खाक हो चुका है। केवल उसका बेटा रामू (अमित कुमार) जीवित बचा है लेकिन सदमें की वजह से उसकी आवाज चली गई है। शंकर अपने बेटे का इलाज करवाना चाहता है लेकिन डॉक्टर को पता नहीं चल पाता कि हुआ क्या है।
फिल्म में युद्ध का कोई दृश्य नहीं
इसी पूरी प्रक्रिया में उसे एक और लड़ाई लड़नी पड़ती है वह है ग्रामीण व्यवस्था के बुरे जमींदारों और साहूकारी व्यवस्था से। इस फिल्म में युद्ध का कोई दृश्य नहीं दिखाया गया है केवल उसकी पृष्ठभूमि में एक जवान अपनी सेवा के लिए पाये मेडल को लेकर लौटता है लेकिन घरेलू दशा यह है कि वह इस मेडल को बेच कर भी अपने बच्चे का इलाज नहीं करवा पाता। गौरतलब यह है कि बच्चे को हुआ कुछ नहीं है, उसकी आवाज केवल सदमे की वजह से चली गई है।
जहां दूर नज़र दौड़ आए
द्वितीय विश्व युद्ध के इस विभीषक घनघोर अंधेरे के बाद चंदा के किरण से धुली आशा सचमुच बहुत कठिन होती है। यह इसलिए भी कठिन है क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ज्ञानानुशासन और कला के तमाम क्षेत्रों में भयानक निराशा और जुगुप्सा का भाव पैदा कर दिया था।
सुरियलिज़्म और दादाइज़्म इसी का परिणाम था। जब पश्चिम के अलावे पूर्व में भी शेक्सपियर के इस कथन –“ जीवन एक इडियट द्वारा कही गई कथा है जिसमें शोर और गुस्सा (साउंड एंड फ्यूरी) भरा है और यह अर्थहीन है (मैकबेथ)” को लोग देखने और सराहने लगे थे। ऐसे में आने वाली पीढ़ी के लिए यह स्वप्न मार्मिक है-
जहां दूर नज़र दौड़ आए,
आज़ाद गगन लहराये
जहां रंग-बिरंगे पंछी, आशा का
संदेशा लाएं
सपनों में पली हस्ती हो कली
जहां शाम सुहानी ढले
जहां ग़म भी न हो, आँसू भी न हो ...
सपनों के ऐसे जहां में जहां प्यार हो प्यार खिला हो
हम जा के वहाँ खो जाएँ
शिकवा ना कोई गिला हो
कहीं बैर न हो कोई गैर न हो
सब मिल के चलते चलें
जहां गम भी न हो, आँसू भी न हो...
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