'दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गयी कि यार का पैग़ाम आ गया'
जिगर मुरादाबादी का यह शेर बता रहा है कि जिगर जिंदगी को भरपूर जीने के बाद मोहब्बत में डूबे हुए मौत का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे थे। मौत से डरने वालों के लिए यह शेर एक पैगाम हो सकता है। जिगर मुरादाबादी-मोहब्बतों का शायर नामक किताब (वाणी प्रकाशन दरियागंज) की भूमिका में प्रसिद्ध शायर निदा फाजली ने लिखा है कि जिगर मुरादाबादी का जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ और वह उस तहजीब के वारिस थे, जिसमें अच्छाई-बुराई और नेकी-बदी की अलग-अलग पहचानें थीं। जिगर ने अपनी इस विरासत का कभी किसी संदर्भ में मुआयना नहीं किया। या यूं कहें कि उनको कृत्रिम जीवन पर भरोसा नहीं था। यहां तक कि जिगर किताबी तालीम को भी शायरी के लिए हानिकारक समझते थे। वह मकतब की प्रारंभिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पाए। जिगर का ऐसा फक्कड़पन भाव मुझे उनके करीब लाता है। जिगर के हमेशा मोहब्बत में डूबे रहने की वजह से मैं उनका मुरीद हूं।
जिगर मिज़ाज से आशिक़ और तबियत से हुस्नपरस्त थे...
उर्दू साहित्यPC: sufinama twitter
निदा फ़ाज़ली किताब में आगे लिखते हैं कि जिगर मिज़ाज से आशिक़ और तबियत से हुस्नपरस्त थे। उनकी आशिक़ाना ज़िंदगी की शुरुआत महज छह साल में शुरू होती है। निदा के अनुसार एक दिन वह घर में अकेले थे। एक कश्मीरी भिखारन की आवाज आई तो वह अपनी बचपन की आंखों से ही उसके सौंदर्य को देखकर ऐसे मुग्ध हो गए कि घर में जितना पैसा और अनाज था, उसके हवाले कर दिया। जब वह आठ साल के थे तो पड़ोस की शादी शुदा औरत के हुस्न पर ऐसी रीझे कि शाम-सबेरे जब देखो, उसके घर में लगे एक बेर के पेड़ के नीचे खड़े नजर आते और उसे घंटों दूर से निहारा करते थे।
निदा ने लिखा है कि आगरा में जिगर वहीदन नामी एक तवायफ को दिल दे बैठे और बाद में उससे शादी भी की। कुछ समय पश्चात आशिको और माशूक के रिश्ते के बीच में गजल का परंपरागत रकीब उन्हें नजर आने लगा और वह हमेशा के लिए अपनी विवाहित प्रेमिका को रकीब के हवाले कर आजाद हो गए। आजादी उनको यहां मिल तो जाती है पर दुखभरी रहती है। दुख को बहलाने के लिए वह मैनपुरी की गायिका शीराजन से मिलते हैं। कई दिनों तक उनमें खोए रहते हैं। यहां भी मोहब्बत की कहानी का अंत ट्रेजिक होता है। इन नाकामियों के बावजूद उनके दिल में न इश्क की आग राख होती है न हुस्न के सम्मान में कमी आती है। हां शराब वह और अधिक पीने लगते हैं। भटकते भी हैं। लेकिन अंग्रेजी शायर मिल्टन की तरह पूरे स्त्री जगत को अपमानित नहीं करते हैं।
जिगर ने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बोहेमियन अंदाज में जिया...
जिगर ने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बोहेमियन अंदाज में जिया है। दिन-रात शराब में सुकून तलाश करने की उन्होंने नाकाम कोशिश की, जहां गए वहीं के हो लिए, पीते-पीते कहीं गिर गए, मुशायरे वाले ढूढ़ते हुए आए और उसी हालत में स्टेज में ले गए। इसी बीच उनकी लोकप्रियता बराबर बढ़ती गई। शराब-शायरी से बदहाल उनकी जिंदगी को उनके समकालीन शायर असगर गोंडवी ने कुछ हद तक सुधारने की कोशिश की। अपनी साली नसीम बेगम की शादी उनसे कर दी। लेकिन वह भी इसी शराबनोशी की नजर हो गई, जिगर की शराब उन दिनों जिगर की कमजोरी थी। इस पर एक शेर भी है-
'सबको मारा जिगर के शेरों ने
और जिगर को शराब ने मारा'
ऐसे में भी जिगर ने शराब का साथ दिया...
जब असगर गोंडवी ने उनकी शराबनोशी को घरेलू जिम्मेदारियों से पूरे तौर से गाफिल होते देखा तो उन्होंने जिगर को शराब और नसीम में से एक को चुनने को कहा, ऐसे में भी जिगर ने शराब का साथ दिया और नसीम को तलाक दे दिया। नसीम के साथ यह अन्याय होता देख असगर और उनकी पत्नी ने इसमें अपने को अपराधी समझा और इसके बदले में पत्नी ने असगर से तलाक ले लिया और असगर को अपनी साली से निकाह करना पड़ा। हालांकि जिगर नसीम से अलग नहीं हो सके। उनके मन में अंदर ही अंदर इश्क सुलगता रहा। अहसासे जुर्म के साथ वह वक्त के साथ दीवानावार मोहब्बत का रूप लेता गया। नसीम के लिए उनके मन में इश्क तड़पने लगा। तभी उन्होंने लिखा-
'यह इश्क नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है'
इश्क की तहजीब का मिसाली प्रतीक बन गए...
जिगर ने इस आग के दरिया में अपने वजूद को इस तरह जलाया कि वह अपने जीवन काल में ही इश्क की तहजीब का मिसाली प्रतीक बन गए। इस आग में वह जितना जले उतने ही उनकी गजल के लफ्ज रौशन हुए। जिगर असगर को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। जिगर और नसीम की मोहब्बत में नया मोड़ उस वक्त आता है जब असगर गोंडवी का देहांत होता है। असगर ने मरते वक्त नसीम को वसीयत की थी कि अगर जिगर शराब छोड़ दे तो उनसे शादी कर लेना। जिगर अब उम्र की उस मंजिल में थे, जहां मोहब्बत ने शराब पर विजय हासिल कर ली थी। नसीम को दोबारा पाने के नशे ने उन्हें हमेशा शराब से दूर कर दिया।
जिगर का यह शेर उन्हें ता उम्र मोहब्बत में डूबा शायर करार देता है। वह लिखते हैं-
'तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
वह जिंदगी तो मोहब्बत की जिंदगी न हुई'
(जिगर मुरादाबादी-मोहब्बतों का शायर किताब का अंश वाणी प्रकाशन दरियागंज दिल्ली)
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जिगर मिज़ाज से आशिक़ और तबियत से हुस्नपरस्त थे...
2 वर्ष पहले
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