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सोचो ! भरी महफिल में कैफ़ साहब के कुर्ते पर पान खा कर थूक दिया, फिर निदा फाज़ली फ़रमाते हैं कि...

कैफ़ भोपाली
                
                                                         
                            बिहार (अब झारखण्ड) के गिरीडीह में मुशायरा था। कैफ़ भोपाली साहब दस्तूर के मुताबिक मंच पर सबसे आगे बैठे थे और हर शायर को जहां बैठे थे, वहीं से एक फुट ऊपर उठकर दोनों हाथ आकाश की तरफ उठाकर और गर्दन हिला-हिलाकर दाद दे रहे थे।
                                                                 
                            

मख़्मूर सईदी उनकी बैठक से 45 अंश के कोण में उनके पीछे अपनी धुन में सिगरेट पर सिगरेट फूंक रहे थे। मुशायरे में शाइरों के आवभगत का जिम्मा सनमाइका के एक बड़े व्यापारी के जिम्मे था। उसने शराब-कबाव के अलावा, सबको अच्छी तरह के ब्रांड के सिगरेट के पैकेट भी दिए थे।

मख़्मूर ने इस उपकार को जल्द ही राख़ बना दिया। पांच सौ पचपन का पूरा पैक़ेट जब ख़त्म हो गया तो उन्होंने उसमें सुराख़ (छेद) करके अपना पीकदान बना लिया। लगातार पान खा-खा उसमें थूकते रहे। और फिर न जाने उन्हें क्या सूझी, निशाना बांधकर उस भरे हुए पैकेट को 'कैफ़' साहब पर उठाल दिया। कैफ़ साहब का कुर्ता पान के धब्बों से भर गया। कैफ़ ने इस हरक़त पर मुड़कर मख़्मूर को देखा और बिना कुछ बोले खामोशी से उठकर बाहर चले गये। 

मख़्मूर की इस नशीली बदतमीज़ी पर मुशायरे में कैफ़ के प्रशंसक जो प्रत्येक मुशायरे की तरह यहां भी काफी संख्या में मौजूद थे, गुस्से में आपे से बाहर हो गये। उन्होंने मख़्मूर को चारों तरफ से  घेर लिया। 
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7 वर्ष पहले

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