बिहार (अब झारखण्ड) के गिरीडीह में मुशायरा था। कैफ़ भोपाली साहब दस्तूर के मुताबिक मंच पर सबसे आगे बैठे थे और हर शायर को जहां बैठे थे, वहीं से एक फुट ऊपर उठकर दोनों हाथ आकाश की तरफ उठाकर और गर्दन हिला-हिलाकर दाद दे रहे थे।
मख़्मूर सईदी उनकी बैठक से 45 अंश के कोण में उनके पीछे अपनी धुन में सिगरेट पर सिगरेट फूंक रहे थे। मुशायरे में शाइरों के आवभगत का जिम्मा सनमाइका के एक बड़े व्यापारी के जिम्मे था। उसने शराब-कबाव के अलावा, सबको अच्छी तरह के ब्रांड के सिगरेट के पैकेट भी दिए थे।
मख़्मूर ने इस उपकार को जल्द ही राख़ बना दिया। पांच सौ पचपन का पूरा पैक़ेट जब ख़त्म हो गया तो उन्होंने उसमें सुराख़ (छेद) करके अपना पीकदान बना लिया। लगातार पान खा-खा उसमें थूकते रहे। और फिर न जाने उन्हें क्या सूझी, निशाना बांधकर उस भरे हुए पैकेट को 'कैफ़' साहब पर उठाल दिया। कैफ़ साहब का कुर्ता पान के धब्बों से भर गया। कैफ़ ने इस हरक़त पर मुड़कर मख़्मूर को देखा और बिना कुछ बोले खामोशी से उठकर बाहर चले गये।
मख़्मूर की इस नशीली बदतमीज़ी पर मुशायरे में कैफ़ के प्रशंसक जो प्रत्येक मुशायरे की तरह यहां भी काफी संख्या में मौजूद थे, गुस्से में आपे से बाहर हो गये। उन्होंने मख़्मूर को चारों तरफ से घेर लिया।
कैफ़ साहब ने जब हालात को बेकाबू होते देखा, तो वे अपने कुर्ते को भूलकर मख़्मूर की वकालत करने लगे। उन्होंने मख़्मूर का हाथ पकड़ा और नाराज़ प्रशंसकों से गुस्से में कहने लगे- '' ये क्या बदतमीजी है। ये हम शायरों की बात है। आपको इसमें दखलंदाजी की कोई जरूरत नहीं, आप अपनी जगहों पर जाइये और मुशायरे को खराब होने से बचाइये। मख़्मूर मेरा भाई है। इससे हाथापाई करेंगे तो मुझे भी इस लड़ाई में मख़्मूर की ओर से शामिल होना पड़ेगा और मुझसे टकराना आप लोगों को मुश्किल पड़ेगा।''
कैफ़ साहब का बदला हुआ रुख देखकर सारी भीड़ बिखर गयी। उनके जाने के बाद अंदर मुशायरा फिर से शुरू हो गया और मंच से बाहर कैफ़ ने मख़्मूर से लिपटकर रोना शुरू कर दिया।
वे रोते हुए कह रहे थे- ''मेरे भाई ! तू तो मुशायरेबाज नहीं है, अच्छा शाइर है। फिर तूने मेरे साथ ऐसा सुलूक क्यों किया। अब मैं ऐसी हालत में क्या ख़ाक मुशायरा पढ़ूंगा। इस समय तो शहर में कोई खादी की सारी दुकानें बंद हो चुकी होंगी। कहां से कुर्ता-पायजामा खरीदूंगा मैं। तूने मेरा मुशायरा खराब कर दिया। तूने मुझसे यह कब की दुश्मनी निकाली ?"
मख़्मूर ने उनकी शिकायत पर उनके आंसू पोंछते हुए कहा- " मैं शर्मिंदा हूं, वाकई बहुत शर्मिंदा हूं। मुझे मुआफ कर दीजिए। न जाने क्यों आपके कपड़ों की चमकती हुई सफेदी मेरी आंखों में चुभने लगी थी। मुझे मुआफ कर दीजिए, पता नहीं ऐसा क्यों हुआ? "
मुशायरे के संयोजक ने यह बातचीत सुनकर अपने घर से नया कुर्ता पायजामा मंगवाकर कैफ़ साहब को पेश किया और कैफ़ साहब ने उसी लिबास में मुशायरा पढ़ा।
साभार: चेहरे, निदा फ़ाज़ली (वाणी प्रकाशन)
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7 वर्ष पहले
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