हिंदी के जाने माने कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी आज पचासी वर्ष के हो रहे हैं। उनके 86 वें जन्मदिन पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर डॉ ओम निश्चल द्वारा लिखित एवं सर्वभाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित आलोचनात्मक पुस्तक कविता के भव्य भुवन में अशोक वाजपेयी का इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में लोकार्पण होगा। इस अवसर पर उन्होंने समकालीन समय और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर उनसे एक विशेष बातचीत भी की है जिसके कुछ संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं।
ओम निश्चल : अशोक जी, आपसे पिछली बातचीत दिसंबर,2013 के आसपास हुई थी। तब से काफी वक्त यानी 12 साल का समय बीत चला है। इस बीच आपकी कई कृतियां आईं। रज़ा फाउंडेशन से कितने ही महत्वपूर्ण प्रकाशन हुए। आपके चयन और रचनावली का प्रकाशन हुआ। कभी-कभार के बाद आपने अन्यत्र अपना कालम लिखना जारी रखा। समय तेजी से भागता रहा। तब आप तिहत्तर की वय के आसपास थे । अब पचासी पार कर रहे हैं। समय और साहित्य में तब से लेकर अब तक क्या तब्दीली आई है ?
अशोक वाजपेयी : इस समय, समय और साहित्य तेजी से भागते-बदलते दिखते हैं। उनमें ख़ासी निरंतरता भी है। समय अधिक क्रूर-हिंसक, अधिक गतिशील, अधिक सक्षम टेक्नालॉजी से परिचालित, अधिक अनुदार और उदार दृष्टि और मूल्यों के अवमूल्यन में व्यस्त, अधिक लोकतान्त्रिक, अधिक हिंस्र, अधिक अंतःकरणहीन हो गया है। समय और अधिक बाज़ार हो गया लगता है। भाषा, संवाद, ज्ञान, तर्कशीलता आदि सभी विद्रूपण में फँस गए हैं। राजनीति से नीति, धर्म से अध्यात्म, सार्वजनिक संवाद से भद्रता और पारस्परिकता, लोकतंत्र से लोक, मीडिया से असलियत, जीने से धीरज और ठहराव, बाज़ार से जिम्मेदारी, शिक्षा से समावेशिता, इतिहास से साक्ष्य, अज्ञान से संकोच आदि लगभग ग़ायब हो रहे हैं। साहित्य में उग्र तात्कालिकता, अधीर, तुरंतापन, विवेकहीन प्रशंसा-निंदा, लोकप्रियता का बढ़ता आकर्षण, सफलता की अंधी दौड़, सार्थकता की अवज्ञा, विफलता का दुर्लक्ष्य आदि बहुत बढ़ गए हैं। ऐसे बदलाव आ गए हैं कि इस समय सच्चा और ईमानदार साहित्य, निडर और निर्भीक साहित्य, एक तरह से, अपने ही समाज और समय के विरुद्ध खड़ा साहित्य है।
ओम निश्चल : इस बीच 2014 से भारत में सत्ता परिवर्तन भी हुआ। राष्ट्रवाद की जैसे आँधी चली कि अब तक सारा देश इसी आबोहवा में बह रहा है। साहित्य को इस आंधी ने कितना प्रभावित किया?
अशोक वाजपेयी : साहित्य ने कुल मिलाकर इस खोखले राष्ट्रवाद, धर्म की आड़ में लादी जा रही एक संकीर्ण, हिंसक, अपवर्जी, राजनैतिक विचारधारा, याराना पूँजीवाद का प्रतिरोध किया है। जो लेखक इस आँधी में पलट कर कहीं और चले गए या आँधी के पक्ष में आ गए, उनकी संख्या कम है और उनमें भी महत्वपूर्ण बहुत कम हैं। अलबत्ता, बड़ी संख्या में युवा लेखकों में इस सभ्यता संकट, राजनैतिक-आर्थिक विपर्यास को लेकर सजगता कुछ कम जान पड़ी है। लेकिन, दूसरी ओर जब भारत में लोकतंत्र सिकुड़ रहा है, हिंदी साहित्य का लोकतंत्र, विशेषतः बड़ी संख्या में स्त्री और दलित लेखकों, इधर आदिवासी लेखकों के उदय और विस्तार से, विस्तृत और अधिक समावेशी हुआ है।
ओम निश्चल : कहा गया कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार सांकेतिक रूप से सत्ता की निरंकुशता के विरोध में लौटाए गए पर वह भी जैसे एक प्रहसन बन कर रह गया। पुरस्कार लोलुप इस समाज में लेखकों के इस सांकेतिक विरोध या पुरस्कार परित्याग से क्या संदेश गया? आज भी इनाम-इकराम को लेकर लेखकों में जो प्रलोभन है, उसका कहना ही क्या। लग रहा कि इसके लिए किसी भी हद तक गिरा जा सकता है।
अशोक वाजपेयी : अवॉर्ड वापसी नाटकीय तो जरूर थी पर उसे प्रहसन कहना उचित नहीं है। उसने आज से 10 साल पहले खलबली तो मचा दी थी। सत्ता को अब बहुत चुभी; इस हल तक कि उसके काफी बाद तक उसके परम शक्तिवान राजनेता उसको नकारात्मक ज़िद कहने को बाध्य हुए। यह सही है कि पुरस्कारों को लेकर हिंदी लेखक समाज में बहुत अस्वस्थ भागदौड़, जोड़-तोड़ बढ़ गई है और उस पर इस महत्वपूर्ण हस्तक्षेप का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पिछले एक दशक में तो असहिष्णुता कई गुना बढ़ गयी है, उसे लेकर लेखक समाज बहुत क्षुब्ध-मुखर नज़र नहीं आता।
ओम निश्चल : आपने अन्यत्र कहा है दूसरी भारतीय भाषाओं में लेखकों की बेहतर स्थिति को लेकर। किन्तु हिंदी का लेखक न समाज में पहचाना जाता है न सत्ता उसे महत्व देती है। वह दिखावे का प्रतीक हो तो हो। हिंदी लेखकों की इस आत्महीनता के क्या मायने हैं ?
अशोक वाजपेयी : इस दुखद स्थिति के लिए थोड़ा-बहुत जिम्मेदार तो लेखक निश्चय ही है, पर बड़ी जिम्मेदारी स्वयं समाज की, उसकी अनेक संस्थाओं, विश्वविद्यालय, हिंदी अध्यापकों, मीडिया आदि की है। मध्य वर्ग की बढ़ती अवसरवादी मूल्यहीनता की भी। वे सभी साहित्य की उपेक्षा और फलतः अनिवार्य हुई लेखकों की सामाजिक हैसियत में कमी के लिए जिम्मेदार हैं। एक अजब अन्तर्विरोध यह है कि हिंदी भाषी संख्या में लगभग 50,00,00,000 हैं, हिंदी अंचल में लिटफेस्ट बहुत लोकप्रिय हैं; हिंदी साहित्य में हर वर्ष कम से कम लगभग 1,00,000 छात्र एमए करते हैं; हिंदी अध्यापकों की हर स्तर पर संख्या किसी अन्य भाषाभाषी अध्यापकों से कई गुना अधिक है। ऐसे में हिंदी समाज अपने महत्वपूर्ण लेखकों न पहचानता है, न उनके साहित्य को व्यापक रूप से बढ़ता-समझता है, न दोनों को कोई सामाजिक मान्यता देता है। हिंदी में लिखना एक अभिशप्त काम है।
ओम निश्चल : इस बीच सोशल मीडिया अपने चरम पर रहा । कभी कहा था लीलाधर जगूड़ी ने कि खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है। आज तो हमारी समूची अभिव्यक्ति ही विज्ञापन के हवाले है। हर कोई डिजिटल कंटेंट और विज्ञापन क्रियेटर तथा रील्स उत्पादक है। मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका सबहिं नचावत राम गुसाईं की हो गयी है। ऐसे में साहित्यकारों के स्वप्नदर्शी समाज का क्या हश्र हुआ ?
अशोक वाजपेयी : चरम पर दोनों रहे - सोशल मीडिया और गोदी मीडिया। सोशल मीडिया ने एक तरह के तुरंतापन को बेहद फैला और लोकप्रिय बना दिया। उसने एक ओर अभिव्यक्ति करने के अधिकार और क्षमता को लोकतांत्रिक विस्तार दिया तो, साहित्य- संस्कृति के क्षेत्रों में कीचड़ उछाल, परस्पर लांछन, फ़तवेबाजी, तत्काल प्रशंसा आदि को बढ़ावा देकर एक तरह की ग़ैर आलोचनात्मक मानसिकता को बहुत संभव और लोकप्रिय बना दिया। माहौल को खराब करने, उसे असभ्य-अभद्र और बाजारू बनाने में उसकी भूमिका बढ़ती गई है। गोदी मीडिया सत्ता के बेशर्म बचाव और उतने ही निर्लज्ज महिमा मंडल में व्यस्त रहा और उसने अपने लगभग सारी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता खो दी। यही नहीं उसने व्यापक समाज में सांप्रदायिकता, घृणा और झूठ, धर्मांधता फैलाने-बढ़ाने में बहुत तत्पर और सक्षम काम किया। फिर भी, तेजस्वी स्वतंत्रचेता, निर्भीक पत्रकारिता ने अपनी जगह बनाई और उसका विस्तार भी होता रहा है। गोदी मीडिया में साहित्य की जगह पहले भी कम थी और अब लगभग ग़ायब हो गई। हिंदी मीडिया तो ऐसे लगातार व्यवहार करता है जैसे इस समय हिंदी में साहित्य लिखा ही नहीं जा रहा है! इस सबके बावजूद, लेखकों को, ऐसे विकट समय में, सच्चाई और स्वप्न दोनों का दबाव बनाए रखना चाहिए; जो भी हो, साहित्य स्वधर्म से विरत नहीं हो सकता।
ओम निश्चल : क्या आपको स्वतंत्रचेता लेखक होने की कीमत चुकानी पड़ी है?
अशोक वाजपेयी : मैं उसका उल्लेख करूँ या ब्योरे दूँ, यह उचित नहीं होगा। जो भी कीमत चुकानी पड़ी है और पड़ेगी, उसे लेकर मेरे मन में कोई संशय नहीं है, न ही क्लेश या खेद। मैंने जो किया वह उस परंपरा में है जिसे स्वाभिमानी, मुझसे कहीं बड़े, और तेजस्वी लेखको ने रचा है।
ओम निश्चल : अज्ञेय जी ने एक चुटकी ली है– लेखक है? आजाद है? मारो स्साले को। पिटाई से न सधे तो बदनाम करो, संखिया-धतूरा कुछ खिला दो, पागलखाने में डाल दो। ये सब भी बेकार हो जाएँ तो शाल-दुशाला, पद-पुरस्करों से लाद कर कुचल दो–वह ब्रह्मास्त्र है! किसी भी विचारधारा से तटस्थ रहते हुए और अपनी धुन के लेखक होकर आपने क्या खोया और क्या पाया है?
अशोक वाजपेयी : अव्वल तो अपनी धुन पाई– यह क्या कम है! बाकी बहुत सारा सद्भाव भी पाया। कुछ अच्छे पाठक भी जो समझ और संवेदना से मेरा साहित्य पढ़ते रहे हैं। पाठ के साथ-साथ कुपाठ और अपाठ भी होता रहा। पर, ‘यह नहीं अभिशाप, ये अपनी नियति है!’ विचारधारा से दूरी या उसके अतिचार और अन्याय से असहमति को विचार-मात्र का विरोधी कहकर देखा गया। आज भारत में जो हो रहा है हिंसा-अत्याचार-अन्याय-हत्या-घृणा-झूठ-सांप्रदायिकता-धर्मांधता आदि सभी एक बेहद विचारधारात्मक समय में ही और उसके कारण हो रहा है। उसमें मनुष्य की मुक्ति, उसके शोषण और अन्याय से मुक्ति, समतामूलक समाज के निर्माण और बहुलता के पोषण और विस्तार का कोई स्वप्न नहीं है। अपनी बढ़ती लोकप्रियता और वर्चस्व के बावजूद हिंदुत्व सर्जनात्मक और बौद्धिक स्तर पर संकीर्ण, अपवर्जी और बाँझ है। उससे मैं कभी तटस्थ या उदासीन नहीं रहा। मैंने लिखकर, बोलकर कविता और गद्य में उसका विरोध, उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक विपन्नता को रेखांकित और ज़ाहिर किया है। बहुत ट्रोल किया जाता हूँ। ईमान को, सच्चाई को, अंतःकरण को, निडरता को, अंतःकरण और साहित्य के सत्व को कोई नृशंस और बलशाली सत्ता कभी कुचल नहीं पाती। मैंने क्या खोया, यह नहीं जानता। न जानने की, हिसाब लगाने की कभी कोई कोशिश की : जो पाया वह यह है कि साहित्य मूलतः नैतिक कर्म है और वह अपने आप में उपलब्धि है।
ओम निश्चल : कविता के इतिहास में कभी नेहरूवियन माडल के विकास का विरोध होता रहा है, आज दक्षिणपंथी अवधारणाओं का। एक स्वतंत्रचेता और वैज्ञानिक समाज के निर्माण में कैसी प्रवृत्तियॉं घातक हैं?
अशोक वाजपेयी : साहित्य हमेशा, कई बार उसके प्रश्रय में पलते हुए भी, सत्ता का प्रतिरोध होता है; वह हर समय प्रति सत्ता होता है। वह नेहरू के जमाने में भी प्रतिरोध था और आज भी है। हमारी आकांक्षा, संवैधानिक रूप से विन्यस्त आकांक्षा, समतामूलक, न्यायसंगत, विवेक मूलक, जाति-लिंग-धर्म आदि से मुक्त नागरिकता, स्वतंत्रता-समता-न्याय और बंधुता को पोसने-बढ़ाने वाली वृत्तियाँ विधेयात्मक हैं और उनसे अलग या उनका विरोध या उनमें कटौती करने वाली वृत्तियां घातक ।
ओम निश्चल : आज चैनलों पर, सोशल मीडिया पर हर कोई कविता बाँच रहा है। कवि पीछे है, नेपथ्य में। बाँचने वाला नायक बना हुआ है। क्या यह कविता और शायरी के प्रति समाज में बढ़ती संवेदनाशीलता, शौक या रुझान का परिचायक है या चर्चा में बने रहने का जतन। वह कवि तो और पिछड़ा है जिसके पास न हुनर है पाठ का न कोई चैनल न वह इसके लिए ख़्वाहिशमंद ही है। इस पर क्या कहेंगे?
अशोक वाजपेयी : कविता में रुचि, उसकी समझ बढ़ाने की हर वृत्ति का स्वागत करना चाहिए। उनमें अपात्रता, विकृतियां, अवसरवादिता आदि भी उभर रही हैं तो यह एक बाजारू समय में लगभग अनिवार्य है। इससे फ़िलमुकाम बर्दाश्त करना चाहिए।
ओम निश्चल : क्या राजनीति की तरह साहित्य में भी यह उपयोगितावादी समय है। साहित्य से स्वाभाविक रसिकता का लोप हो रहा है, इसका कारण क्या है?
अशोक वाजपेयी : साहित्य को साहित्य की तरह समझ और संवेदना के साथ पढ़ने वाले यानी रसिक पहले भी कम थे, अब और भी कम हो रहे हैं। उसे आजकल अक्सर बहुतेरे सामाजिक या राजनैतिक या सांस्कृतिक दस्तावेज़ की तरह पढ़ते-घूमते हैं सारे यथार्थ को निरे सामाजिक यथार्थ में बदलने के दुराग्रह का ये अनिवार्य परिणाम है। दुर्भाग्य यह भी है कि साहित्य को, विचार को, संसार और आत्मा को, समाज और व्यक्ति को, अध्यात्म और लौकिकता को अपने ढंग से देखने की विधा मानने में बहुत संकोच है। भाषा का, पढ़ने का आनंद लेने वाले घटते गए हैं। यह खेद और चिंता दोनों का विषय है।
ओम निश्चल : आपकी कविता मुझे शहरी नागरिकता की कविता लगती है– नफ़ासत और औदात्य से भरी जिसमें उम्मीद और नाउम्मीदी दोनों की व्यंजनाएँ हैं। अंतर्वस्तु और मिज़ाज में कहीं कहीं विरोधाभास और असमंजस भी दृष्टिगत होता है, क्या यह हर कवि-लेखक के साथ होता है। इस दृष्टि से क्या आपने अपना अंत:परीक्षण किया है?
अशोक वाजपेयी : कविता, अपने सबसे सघन-उत्कट-मार्मिक रूप में सामान्यीकरण, समग्रीकरण आदि के विरुद्ध अथक सत्याग्रह होती है– यह मैं बारहा कहता रहा हूँ। हमारी सच्चाई में बहुत सारे अंतर्विरोध, विडंबनाएँ, असमंजस और दुविधाएँ होती हैं और कविता उनसे बच नहीं सकती। मैं एक छोटे शहर में पला-बढ़ा और उसके लोक अंचल से मेरा कोई विशेष संबंध नहीं बन पाया। बुंदेलखंड मेरी कविता में वैसे नहीं आ पाया जैसा कि विनोद कुमार शुक्ल के यहाँ छत्तीसगढ़ आता रहा है। इस अभाव ने मुझे साला है।
ओम निश्चल : साहित्य का अपना उच्चादर्श होता है। समाज को बदलने की जाने कितनी प्रतिज्ञाएँ साहित्य ने कीं। यह हलफ़ उठाने से आपकी कविताएँ भी पीछे नहीं रहीं और पतन की ढलान पर जाती मनुष्यता और सत्ता व्यवस्था पर आपकी टिप्पणियां बराबर आती रहती हैं। आज जैसा भी समाज है ज्ञान-विज्ञान, तकनालाजी और मीडिया प्रसार से संवलित–आगे का समाज अपने स्वभाव में कितना स्वाभाविक होगा या हम एक नकली समाज, नकली संवेदना संसार की तरफ बढ़ रहे हैं?
अशोक वाजपेयी : आप यह देख-समझ पाए इसके लिए आभार। भविष्यदर्शी नहीं हूँ पर जिस उत्साह, हेकड़ी और आत्मविश्वास के साथ हमारा पतन हो रहा है उससे लगता है कि हम एक नकलची समाज तो ज्यादातर बन ही गए हैं और नकली समाज बनने में बहुत देर नहीं लगेगी। पर यह मानने को मन, कम से कम मेरा मन, अब भी तैयार नहीं है कि मनुष्य के स्वभाव से उदारता, उदात्तता, पारस्परिकता, सहयोग-सहकार, पीर पराई का एहसास और जिम्मेदारी, अंतःकरण और सर्जनात्मकता पूरी तरह से ग़ायब या अशक्त हो जाएंगे। अगर यह गुण जैविक हैं तो दब भले जाएँ, उभरेंगे और अगर सांस्कृतिक हैं तो मनुष्य फिर इनकी पुनर्रचना करने से विरत नहीं हो सकता।
ओम निश्चल : आज हर तरफ भारतीय ज्ञान परंपरा का गान हो रहा है। ढंग से संस्कृत न जानने वाला समाज ज्ञान परंपरा की गाय को दुहने पर आमादा है। वह अतीतगामी हुआ जाता है। अपनी ज्ञान परंपरा की जड़ताओं को ढोने और उसकी दुंदुभि बजाने से क्या समाज ज्ञानी हो जाएगा या वह इसी तरह अपने अज्ञान को ढकने के लिए ही ज्ञान परंपरा की मशाल जलाता रहेगा?
अशोक वाजपेयी : यह नोट करना दिलचस्प है कि ज्ञान को लेकर शोरगुल के साथ-साथ अज्ञान का लगातार महिमामंडन हो रहा है, हर दिन राजनेता-धर्मगुरु-टिप्पणीकार ज्ञान का कुछ न कुछ अपमान करते रहते हैं। दूसरे, ये भारतीय ज्ञान परंपरा में सिर्फ हिंदू चिंतन नहीं, बौद्ध-जैन-सिख-इस्लामी चिंतन भी शामिल है और उसे समृद्ध करते रहे हैं। उनके बीच संवाद हुए हैं। उन्हें भुलाकर या दरकिनार कर जिस चिंतन को बढ़ावा दिया जा रहा है वह प्रामाणिक रूप से भारतीय चिंतन नहीं है, आधा-अधूरा और अपर्याप्त है। फिर हमारी ज्ञान परंपरा की चुप्पियों, विकृतियों, उनसे विकसित हुई सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रति आलोचनात्मक रुख के बगैर इस परंपरा को न ठीक से समझा-आँका जा सकता है, न ही इन्हें हमारे समय और समाज के लिए पुनराविष्कृत किया जा सकता है।
ओम निश्चल : और अंत में बकौल मुक्तिबोध–- अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया? उत्तर जीवन के इस मोड़ कर आकर क्या महसूस करते हैं?
अशोक वाजपेयी : जितना कर सकना चाहिए था उतना नहीं कर पाया; लिखने, आयोजन-संपादन आदि अनेक क्षेत्रों में जिनमें मैं सक्रिय रहा हूँ। बहुत समय आलस्य में बीता जिसे बचाया जा सकता था। जो किया वह किसी तरह से भी काफी नहीं है। पर श्रीकांत वर्मा की पंक्ति याद करता हूँ ‘जो मुझसे नहीं हुआ, मेरा संसार नहीं’। बहुत निराश हूँ पर निष्क्रिय नहीं।
ओम निश्चल : शेष जीवन की प्रतिज्ञाओं और प्रतिश्रुतियों में क्या कुछ है जिसकी परियोजनाएँ आपने बना रखी होंगी?
अशोक वाजपेयी : वे, हमेशा की तरह, बहुत और महत्वाकांक्षी है। उन्हें क्या गिनाना? इधर लगभग एक साल से अपने सहयोगी पीयूष दईया के साथ बात कर एक टूटा-बिखरा आत्मवृत्तांत दर्ज कर रहा हूँ जो शायद इस वर्ष पूरा हो जाए।
अमर उजाला एप इंस्टॉल कर रजिस्टर करें और 100 कॉइन्स पाएं
केवल नए रजिस्ट्रेशन पर
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही
अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज आपके व्हाट्सएप पर
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X