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Rahim Ke Dohe:  जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं

साहित्य
                
                                                         
                            रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल।
                                                                 
                            
ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति, मोल रहीम बिसाल॥

भावार्थ:-
रहीम कहते हैं कि किसी की रूप-माधुरी, कथा का कथानक, कविता, चारु पट, सोना, छंद और मोती-माणिक्य का ज्यों-ज्यों सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो इनकी ख़ूबियाँ बढ़ती जाती है। यानी इन सब की परख के लिए पारखी नज़र चाहिए।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥

भावार्थ:-
रहीम कहते हैं कि अपने मन के दुःख को मन के भीतर छिपा कर ही रखना चाहिए। दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता।
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23 घंटे पहले

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