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तुलसीदास के 5 चुनिंदा दोहे

साहित्य
                
                                                         
                            दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर। 
                                                                 
                            
संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥ 


भावार्थ:- दुर्जन शीशे के समान होते हैं, इस बात को ध्यान से देख लो, क्योंकि दोनों ही जब सामने होते हैं तब तो और होते हैं और जब पीछ पीछे होते हैं तब कुछ और हो जाते हैं। भाव यह है कि दुष्ट पुरुष सामने तो मनुष्य की प्रशंसा करता है और पीठ पीछे निंदा करता है, इसी प्रकार शीशा भी जब सामने होता है तो वह मनुष्य के मुख को प्रतिबिंबित करता है; पर जब वह पीठ पीछे होता है तो प्रतिबिंबित नहीं करता।
 

‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान। 
पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥ 

भावार्थ:-
 गोस्वामी जी कहते हैं कि शरीर मानो खेत है, मन मानो किसान है। जिसमें यह किसान पाप और पुण्य रूपी दो प्रकार के बीजों को बोता है। जैसे बीज बोएगा वैसे ही इसे अंत में फल काटने को मिलेंगे। भाव यह है कि यदि मनुष्य शुभ कर्म करेगा तो उसे शुभ फल मिलेंगे और यदि पाप कर्म करेगा तो उसका फल भी बुरा ही मिलेगा।
 
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3 वर्ष पहले

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