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Hindi Shayari: बशीर बद्र के चुनिंदा शेर

उर्दू अदब
                
                                                         
                            मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
                                                                 
                            
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
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2 सप्ताह पहले

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