दोनों हाथों की हथेलियों को वे हरदम मलते हैं
सूनी आंखों में बीते लम्हों के सपने पलते हैं
छड़ी पुरानी टूट गई आंखों का चश्मा फूट गया
पैर नहीं चलने देते दीवाल पकड़ कर चलते हैं
सबको बाबू जी लगते हैं, जिस दिन पेंशन आती है
बाकी दिन बहुओं के ताने सुन सुन कर ओ जलते हैं
धुंधली आंखों से अम्मा की फोटो देख नहीं पाते
अम्मा की यादों से अपने दुःख को साझा करते हैं
बहुत बुलाने पर भी बच्चे उनके पास नहीं आते
खूब जानते हैं बच्चे मम्मी पापा से डरते हैं
जीते हैं पर जीने का अहसास नहीं उनको होता
घुट घुट कर जीने वाले ना जीते हैं ना मरते हैं
मौत उन्हें दे देना यारब उनकी भरी जवानी में
जो बूढ़ा हो कर औलादों के टुकड़ों पर पलते हैं
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