ताक़तवर से हाथ मिलाए जाएंगे,
चिड़ियों से अब बाज़ लड़ाए जाएंगे।
धूप के जाए हैं तो ये होना ही है,
दीवारों से आगे साए जाएंगे।
कभी जिन्हें हमसे सुनकर कंठस्थ किया,
हमको ही वो शेर सुनाए जायेंगे।
आंधी का वादा है अबके मौसम में,
तेज़ हवा से पेड़ बचाए जाएंगे।
हम अरावली के ज़ख़्मो में शामिल हैं
हम पर अब अहसान जताए जाएंगे ।
अहसासात के बुरे दिनों में होगा ये,
लाशों के फिर बोझ उठाए जाएंगे।
अमन चैन तो लहू में लाल हुआ लेकिन,
अब भी कबूतर नभ में उड़ाए जायेंगे।
- सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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