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उबैदुल्लाह अलीम: मिरे शहर जल रहे हैं मिरे लोग मर रहे हैं

obaidullah aleem famous ghazal main ye kis ke naam likhoon jo alam guzar rahe hain
                
                                                         
                            


मैं ये किस के नाम लिक्खूँ जो अलम गुज़र रहे हैं
मिरे शहर जल रहे हैं मिरे लोग मर रहे हैं

कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो कोई शाख़ हो शजर हो
वो हवा-ए-गुलसिताँ है कि सभी बिखर रहे हैं

कभी रहमतें थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता-ए-ज़मीं पर
वही ख़ित्ता-ए-ज़मीं है कि 'अज़ाब उतर रहे हैं

वही ताएरों के झुरमुट जो हवा में झूलते थे
वो फ़ज़ा को देखते हैं तो अब आह भर रहे हैं

बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की
सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं

कोई और तो नहीं है पस-ए-ख़ंजर-आज़माई
हमीं क़त्ल हो रहे हैं हमीं क़त्ल कर रहे हैं

13 घंटे पहले

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