आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क़मर जलालाबादी: जो न समझे वो बनाते रहे लाखों बातें

उर्दू अदब
                
                                                         
                            वो सितम-गर है ख़यालात समझने वाला
                                                                 
                            
मुझ से पहले मिरे जज़्बात समझने वाला

मैं ने रक्खा है हमेशा ही तबस्सुम लब पर
रो दिया क्यूँ मिरे हालात समझने वाला

जो न समझे तेरी मंज़िल वो यूँही चलता रहा
रुक गया तेरे मक़ामात समझने वाला

जो न समझे वो बनाते रहे लाखों बातें
हुआ ख़ामोश तिरी बात समझने वाला

राज़-ए-तक़्दीर पे क्या रौशनी डालेगा कोई
ख़ुद सवाली है सवालात समझने वाला

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर