आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हिंदी कविता: पुनीत गुप्त की कविता 'मुस्कुरा दो, कि अँधेरे की ये रात लम्बी है'

puneet gupt hindi kavita muskura do ki ye andhere ki raat lambi hai
                
                                                         
                            

मुस्कुरा दो, कि अँधेरे की ये रात लम्बी है 
मुस्कुरा दो, कि फिर ये दिन निकल आये
मुस्कुरा दो, कि गुलों का रंग फीका है 
मुस्कुरा दो, कि गुलशन में फिर बहार आये
मुस्कुरा दो, कि वक़्त जैसे थम-सा गया है
मुस्कुरा दो, कि हर लम्हा फिर संवर जाए
मुस्कुरा दो, कि ये मासूम ख्वाब ना टूटे 
मुस्कुरा दो, कि चाहत को मंज़िल नज़र आये
मुस्कुरा दो, कि सफ़र में अब भी धुंध बाकी है 
मुस्कुरा दो, कि राहों को कहीं चिराग मिल जाए
मुस्कुरा दो, मुस्कुराना इश्क़ की रिवायत है 
मुस्कुरा दो, कि उल्फत को जुबां मिल जाए
मुस्कुरा दो, मुस्कुरा दो
- पुनीत गुप्त 

 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
                                                                 
                            

                                                                                            
2 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर