मुस्कुरा दो, कि अँधेरे की ये रात लम्बी है
मुस्कुरा दो, कि फिर ये दिन निकल आये
मुस्कुरा दो, कि गुलों का रंग फीका है
मुस्कुरा दो, कि गुलशन में फिर बहार आये
मुस्कुरा दो, कि वक़्त जैसे थम-सा गया है
मुस्कुरा दो, कि हर लम्हा फिर संवर जाए
मुस्कुरा दो, कि ये मासूम ख्वाब ना टूटे
मुस्कुरा दो, कि चाहत को मंज़िल नज़र आये
मुस्कुरा दो, कि सफ़र में अब भी धुंध बाकी है
मुस्कुरा दो, कि राहों को कहीं चिराग मिल जाए
मुस्कुरा दो, मुस्कुराना इश्क़ की रिवायत है
मुस्कुरा दो, कि उल्फत को जुबां मिल जाए
मुस्कुरा दो, मुस्कुरा दो
- पुनीत गुप्त
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