कितना अजीब है ना, दिसंबर और जनवरी का रिश्ता
जैसे पुरानी यादों और नए वादों का किस्सा
दोनों काफ़ी नाज़ुक हैं, दोनो में गहराई है
दोनों वक़्त के राही हैं, दोनों ने ठोकर खायी है
यूं तो दोनों का है, वही चेहरा वही रंग
उतनी ही तारीखें और उतनी ही ठंड
पर पहचान अलग है दोनों की,
अलग हैं अंदाज़ और अलग हैं ढंग
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