{"_id":"698bd75f3510b505a80bd6a6","slug":"amar-ujala-shabd-samman-2025-mamta-kalia-arambam-ongbi-memchoubi-to-receive-akashdeep-shresth-kriti-samman-2026-02-11","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"\u0905\u092e\u0930 \u0909\u091c\u093e\u0932\u093e \u0936\u092c\u094d\u0926 \u0938\u092e\u094d\u092e\u093e\u0928 2025: \u092e\u092e\u0924\u093e \u0915\u093e\u0932\u093f\u092f\u093e \u0914\u0930 \u0905\u0930\u092e\u092c\u092e \u0913\u0902\u0917\u092c\u0940 \u092e\u0947\u092e\u091a\u094c\u092c\u0940 \u0915\u094b '\u0906\u0915\u093e\u0936\u0926\u0940\u092a', \u0907\u0928\u094d\u0939\u0947\u0902 \u092e\u093f\u0932\u0947\u0917\u093e \u0936\u094d\u0930\u0947\u0937\u094d\u0920 \u0915\u0943\u0924\u093f \u0938\u092e\u094d\u092e\u093e\u0928","category":{"title":"Kavya","title_hn":"\u0915\u093e\u0935\u094d\u092f","slug":"kavya"}}
अमर उजाला शब्द सम्मान 2025: ममता कालिया और अरमबम ओंगबी मेमचौबी को 'आकाशदीप', इन्हें मिलेगा श्रेष्ठ कृति सम्मान
ममता कालिया, विख्यात कथाकार
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
सर्वोच्च सम्मान- आकाशदीप - हिंदी (जीवन की बेचैनी)
भाषा और साहित्य के रूप में अंग्रेजी ने मेरे लिए साहित्य के प्रति जुनून के जादुई द्वार खोल दिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में एमए की छात्रा थी, वहां पुस्तकालय और गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों की उपलब्धता ने जीवन और साहित्य के प्रति मेरी सोच को बदल दिया। मुझे ऊंची उड़ान भरने के लिए नए पंख मिले। मैं पहले से ही हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखती थी, लेकिन बाद में कथा में दिलचस्पी बढ़ गई। मैंने 38 वर्ष अध्यापन और प्रशासन में बिताए। अध्यापन भी एक सीखने की प्रक्रिया है। छात्रों ने नए विचार दिए और ग्रहण किए। मुझे इतनी अविवाहित महिला कामगारों से मिलने का अवसर मिला कि वे मेरी चिंताओं की महत्वपूर्ण प्रवक्ता बन गईं। दिल्ली के अलावा इलाहाबाद से भी मेरा गहरा नाता रहा। इलाहाबाद इसलिए अनोखा है, क्योंकि यह मुख्य रूप से लेखकों, शिक्षाविदों, वकीलों और डॉक्टरों का शहर है। मेरा जुड़ाव लेखकों से अधिक था और मुझे लगा कि उनकी चिंताओं को कलमबद्ध किया जाना चाहिए। इलाहाबाद में हर कोई बौद्धिक सोच रखता है। मैं कई शहरों में रह चुकी हूं, लेकिन इलाहाबाद अद्वितीय है और इसकी झलक आप मेरी किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ में देख सकते हैं।
‘कितने शहरों में कितनी बार’ किताब मैंने तब लिखी थी, जब एक दिन उंगलियों पर गिनने की कोशिश की कि मैं अब तक कहां-कहां रह चुकी हूं। मेरे पिता के तबादलों ने मुझे घुमक्कड़ बना दिया था। बाद में मेरे पति रवि के प्यार ने मुझे बंजारा बना दिया। इसने मेरे जीवन की उस बेचैनी को भी उजागर किया, जो उसका एक हिस्सा थी। मैंने मथुरा, दिल्ली, नागपुर, मुंबई, पुणे, इंदौर, इलाहाबाद और कोलकाता के अपने अनुभवों को संक्षेप में याद किया है। मुझसे ज्यादा अव्यवस्थित लेखक शायद ही मिले। कोई योजना नहीं, कोई नोट्स नहीं, कोई पहला ड्राफ्ट नहीं। मैं बस लिखती हूं और पहला आवेग ही मेरा अंतिम प्रहार होता है। मुझे विषय अचानक और तेजी से सूझते हैं। लेकिन आज का परिदृश्य बहुत गतिशील है, इसलिए हमें खूब पढ़ना चाहिए। मेरा मानना है कि जब तक आप पढ़ते नहीं, तब तक लेखक नहीं बन सकते। वास्तव में, हमें लिखने से ज्यादा पढ़ना चाहिए। मुझे पढ़ने की लत है। लिखने से ज्यादा। खूब पढ़ती हूं। नए पुराने सबको। हां, लिखते समय उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इससे क्या घबराना।
मेरी किताबों के भावी पाठकों को शिक्षित पुरुषों और महिलाओं के उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे, जो मुश्किल समय में अपना रास्ता बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पुरुषों और महिलाओं के लिए जीवन कभी भी आसान नहीं रहा है। जितनी कम उम्र होती है, उतनी ही ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। महिलाओं का जीवन और भी कठिन होता है, क्योंकि उन्हें अपने कॅरिअर और परिवार दोनों को संभालना पड़ता है। मेरा मानना है कि जीवन का मजा तो हमेशा काम करते रहने में है। जो काम करेगा, वह नई दौड़ जीतेगा। - ममता कालिया, विख्यात कथाकार
अगली स्लाइड देखें
कमेंट
कमेंट X