तुम मन से कितने सुंदर हो
तुम तन से कितने पावन हो
है तुमसे
किसी जनम का
मेरा नाता बहुत सघन;
ओ, अनुरागी मन!
ओ, अनुरागी मन!!
तुमको देखा तो आंखों में
कुछ स्वर्णिम सपने तिर आए
सोचों में सावन झूम उठा
सांसों में बादल घिर आए
नजरों से नजरें मिलीं
हृदय में जैसे खिला चमन।
ओ अनुरागी मन।
अनुभव की गहरी नदिया में
तुमने गोते खाए होंगे
जीवन के समीकरण उलझे
कितने ही सुलझाए होंगे
अब एक पहेली सुलझा दो
क्यों भीगे हुए नयन?
ओ अनुरागी मन।
जिस पथ पर चल कर आए हो
जिस पथ से होकर जाना है
माना, मंजिल है दूर बहुत
पर तनिक नहीं घबराना है
मेरे कांधे पर हाथ धरो
बस जाए नया भुवन।
ओ अनुरागी मन!
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