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किताब समीक्षा: दीवारों पर लिखी गई उम्मीद की खिड़कियाँ

deewaron par likhi gayi ummeed ki khudkiyan book review in hindi
                
                                                         
                            
समीक्षक - प्रत्युष प्रशांत 

मैं दीवारों पर खिड़कियां लिख रही हूं (कविता संग्रह) - अनामिका अनु
वाणी प्रकाशन, पहला संस्करण 2026

विनोद कुमार शुक्ल के चर्चित उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' से बिल्कुल अलग संवेदना और काव्य-भूमि रचता है अनामिका अनु का कविता-संग्रह 'मैं दीवारों पर खिड़कियां लिख रही हूं'। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित यह संग्रह पाँच खंडों में विभाजित है। इसकी काव्य-यात्रा ‘वह’ जैसे एक सर्वनाम से आरंभ होती है और ‘मेरा कोई घर नहीं’ के उद्घोष तक पहुँचती है। यह यात्रा केवल कविताओं की नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति, स्त्री-अस्तित्व और आत्म-अन्वेषण की भी यात्रा है।

संग्रह की कविताएँ अपने हर पड़ाव पर पाठक को एक नए अर्थ-संसार में ले जाती हैं। ‘विरह प्रेम से टपका सुख है’, ‘मैं दीवारों पर खिड़कियां लिख रही हूं’, ‘कविता ज़िन्दगी का लिखत ही तो है’, ‘पानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती है’ और ‘जिसने भी लिखी है एक अच्छी कविता वह उम्मीद से है’ जैसे खंड पाठक को बार-बार ठहरने और लौटकर देखने के लिए विवश करते हैं. इन कविताओं के बिंब, लोक-संवेदना और आत्मीय भाषा लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती है। 

यह काव्य-यात्रा दरअसल उन खिड़कियों की तलाश है जिन्हें कवयित्री दीवारों पर लिखती है ताकि बंद दुनिया में भी हवा, रोशनी और उम्मीद का प्रवेश बना रहे. संग्रह की कविताएँ संवाद, अभिव्यक्ति और पारदर्शिता की वकालत करती हैं। वे दीवारों के रूपक में मौजूद सामाजिक बंदिशों, लैंगिक असमानताओं और तयशुदा भूमिकाओं को पहचानती हैं, लेकिन वहीं ठहरती नहीं। वे उन दीवारों पर खिड़कियाँ और दरवाज़े बनाती हैं जहाँ से स्वतंत्रता, नए दृष्टिकोण और नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं. इस तरह संग्रह का केंद्रीय बिंब केवल प्रतिरोध का नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण और उम्मीद का बिंब बन जाता है। 

संग्रह की सबसे प्रभावशाली कविताओं में ‘चाह’ उल्लेखनीय है. इस कविता में स्त्री की स्वतंत्र पहचान की आकांक्षा अत्यंत सशक्त रूप में व्यक्त हुई है। कवयित्री लिखती हैं —

 “औरतें बुरांश के फूल नहीं होना चाहतीं
 वे नहीं चाहतीं पिसना, शरबत बनना और देव-अर्पित होना।
 वे पत्तियाँ होना चाहती हैं,
 वह भी उस वृक्ष का
 जो अब तक खोजा और जाना नहीं गया है...”

यह कविता स्त्री-विमर्श को नारेबाजी से अलग ले जाकर स्वतंत्र अस्तित्व की गहरी मानवीय आकांक्षा में बदल देती है. यहाँ स्त्री किसी संरक्षित पहचान की नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जीवन जीने की इच्छा व्यक्त करती है. वह अपने लिए ऐसी जगह की कल्पना करती है जिसकी कोई तय जाति, धर्म, परिधि या संरक्षक न हो। 

प्रेम इस संग्रह का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्वर है. ‘प्रेम स्वयंभू होता है’ कविता में प्रेम और विरह को भारतीय शास्त्रीय संगीत के बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया गया है. कवयित्री लिखती हैं—

 “प्रेम स्वयंभू होता है
 जैसे राग मालकौंस...
 विरह प्रेम के गर्भ से निकलता है
जैसे चन्द्रकौंस निकलता है मालकौंस से...”

यहाँ प्रेम केवल रोमानी अनुभव नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर जन्म लेने वाली एक कलात्मक और आध्यात्मिक अनुभूति है. संगीत, स्मृति और संवेदना के सहारे कविता प्रेम को ऐसी ऊँचाई देती है जहाँ वह निजी अनुभव होते हुए भी सार्वभौमिक बन जाता है। 

इसी तरह ‘चित्र’ कविता संग्रह की वैचारिक ऊँचाइयों का परिचय देती है. भारतीय चित्रकला परंपरा के अनेक चित्रों को आधार बनाकर कवयित्री यह प्रश्न उठाती हैं कि राजाओं, देवताओं और पुरुष-उत्सवों के चित्रों में स्त्रियों की विवशता और उनकी स्वतंत्रता की आकांक्षा को क्यों अदृश्य कर दिया गया. कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष तब सामने आता है जब वह कहती है—

“उन्हीं स्त्रियों के तप से आज
 हम में से कुछ लोगों के हाथों में आ गयी हैं क़लम-कूचियां,
 हमारे कण्ठ में खदक रही हैं बुलन्द आवाज़ें...”

यह कविता इतिहास, कला और स्त्री-अनुभव के बीच एक सार्थक संवाद रचती है, साथ ही यह वर्तमान पीढ़ी की स्त्रियों के सामने एक नैतिक ज़िम्मेदारी भी रखती है. यथार्थ को यथार्थ की तरह लिखने और रंगों के साथ ईमानदार व्यवहार करने की ज़िम्मेदारी।

संग्रह की भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है. इसमें लोकजीवन की मिट्टी है, घरेलू जीवन की गंध है और प्रकृति से निकले ऐसे बिंब हैं जो सीधे पाठक की स्मृति में जगह बना लेते हैं. ‘पानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती है’ जैसी कविता में प्रेम और स्मृति का जो ग्रामीण सौंदर्य उपस्थित होता है, वह समकालीन हिंदी कविता में दुर्लभ होता जा रहा है. लोक और निजी अनुभव यहाँ एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि कविता पाठक के अपने अनुभव का हिस्सा बन जाती है।

अनामिका अनु की कविताओं में न तो अनावश्यक बौद्धिक जटिलता है और न ही भावुकता का अतिशय. उनकी भाषा बेहद ईमानदार, आत्मीय और जीवन के निकट है. कविताएं पढ़ते हुए बार-बार लगता है मानो कोई बहुत अपना व्यक्ति धीमे स्वर में जीवन की सबसे ज़रूरी बातें कह रहा हो। यही कारण है कि यह संग्रह पढ़ने के बाद समाप्त नहीं होता, बल्कि पाठक के भीतर लंबे समय तक गूँजता रहता है। 

मैं दीवारों पर खिड़कियां लिख रही हूं केवल एक कविता-संग्रह नहीं, बल्कि उम्मीद, प्रेम, स्मृति और स्त्री-अस्तित्व की खोज का दस्तावेज़ है। यह संग्रह याद दिलाता है कि दुनिया चाहे जितनी दीवारों से भर जाए, कविता हमेशा उन पर खिड़कियाँ लिखने का साहस बचाए रखती है, और शायद यही किसी अच्छी कविता की सबसे बड़ी सफलता भी है। 
10 घंटे पहले

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