मुनव्वर राना उर्दू अदब के मकबूल नामों में से एक हैं और गोपालदास नीरज हिंदी कविता व गीतों की एक मशहूर हस्ती हैं। दोनों का एक दूसरे से प्रभावित होना स्वाभाविक ही है। गोपालदास नीरज से हुई पहली मुलाक़ात के बारे में मुनव्वर राना किताब ‘ढलान से उतरते हुए’ में लिखते हैं कि…
“नीरज की शख़्सियत की जादूगरी और उनकी तख़्लीकी हुनरकारी से तो मैं बहुत पहले से वाकिफ़ था लेकिन उनके दीदार की दौलत से मेरी आँखें पहली बार मालामाल हो रही थीं। अपनी शोहरत और नामवरी से बेपरवाह नीरज साहब की कलन्दरी मुझे अच्छी लगी। मैंने उनकी इस सादा मिजाज़ी की दुआएं मांगी और उनकी इस कलन्दरी की राख अपने चेहरे पर मल ली।
ज़िन्दादिली के साथ ज़िन्दा रहने का हुनर नीरज साहब से ज़्यादा किसी को नहीं आता।”
नीरज के साथ हुए एक मज़ाहिया वाक़ये को याद करते हुए मुनव्वर लिखते है कि
एक बार देहली के किसी होटल में नीरज भाई ठहरे हुए थे, उनके रूम का दरवाज़ा खोलकर अचानक एक ख़ूबसूरत ख़ातून दाख़िल हुई लेकिन फ़ौरन ही उन्होंने यह कहकर पलटना चाहा कि माफ़ कीजिएगा, मैं ग़लत कमरे में आ गयी। नीरज साहब ने कहकहा लगाते हुए कहा कि मैडम, कमरा तो सही है लेकिन आप ग़लत उम्र में हमारे पास आयी हैं।
सच्चाई तो यही है कि बढ़ती हुई उम्र और ख़तरनाक बीमारियों से बहादुरी के साथ जूझने का नाम ही गोपालदास नीरज है।
साभार- वाणी प्रकाशन
ढलान से उतरते हुए
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