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अशोक अंजुम की हास्य ग़ज़ल: साड़ी न थी पसन्द तो लेते उसे बदल

उर्दू अदब
                
                                                         
                            क्या-क्या न सहे हमने सितम आधी रात तक
                                                                 
                            
बेगम को नहीं आया रहम आधी रात तक

साड़ी न थी पसन्द तो लेते उसे बदल
रोते ही रहे हाए सनम आधी रात तक

रोटी के इन्तजार में कुल कुनबा सो गया
लेकिन हुआ तवा न गरम आधी रात तक

कुछ तो बताइए कि तुम्हें क्या दूँ गिफ्ट मैं
उनकी हुई न दूर शरम आधी रात तक

पन्द्रह अगस्त दिन था सभी को था इन्तजार
बच्चा नहीं ले पाया जनम आधी रात तक

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5 महीने पहले

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