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साहिर लुधियानवी: हमें भी नहीं इल्म हम जिस पे रोए

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यूंही दिल ने चाहा था रोना-रुलाना
तिरी याद तो बन गई इक बहाना

हमें भी नहीं इल्म हम जिस पे रोए
वो बीती रुतें हैं कि आता ज़माना

ग़म-ए-दिल है और ग़म-ए-ज़िंदगी भी
न इस का ठिकाना न उस का ठिकाना

कोई किस पे तड़पे कोई किस पे रोए
इधर दिल जला है उधर आशियाना
 

21 घंटे पहले

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