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माणिक वर्मा की हास्य कविता: रात के बारह बजे

माणिक वर्मा की हास्य कविता: रात के बारह बजे
                
                                                         
                            रूप की जब की बड़ाई, रात के बारह बजे 
                                                                 
                            
शेरनी घेरे में आई, रात के बारह बजे 

कल जिसे दी थी विदाई, रात के बारह बजे 
वो बला फिर लौट आई, रात के बारह बजे 

हम तो अपने घर में बैठे तक रहे थे चांद को 
और चांदनी क्यों छत पे आई, रात के बारह बजे  आगे पढ़ें

15 घंटे पहले

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