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उषा उपाध्याय की कविता- ऐसा मित्र मिले

कविता
                
                                                         
                            रो सकें जिनके कंधे पर सर रखकर, ऐसा मित्र मिले,
                                                                 
                            
कालांतर तक हो अचल, बस एक ऐसा छत्र मिले ।

है यूँ तो चंचल हर कोई रंग इस संसार के,
मृत्यु तलक हो साँस में जिसकी महक, वह इत्र मिले ।

बाढ़ की उत्ताल लय में, बिजली कड़के, पाल टूटे राह में,
उस समय जो नाव लगाए पार, वह नक्षत्र मिले ।

और बाट जिसकी देखी हो कितने ही वर्षों तक,
वह मौत की मंज़िल पर आकर मिले, वह पत्र मिले ।

सब कुछ ही हो पूर्ण ऐसी ज़िन्दगी में क्या मज़ा है ?
अपने ही रंगो से अंकित करूँ ऐसा अधूरा चित्र मिले ।

मूल गुजराती से अनुवाद : स्वयं कवयित्री द्वारा

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5 घंटे पहले

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