आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कमलेश राजहंस: उसने मुझे शूलों पर चलना सिखा दिया

उर्दू अदब
                
                                                         
                            उसने मुझे शूलों पर चलना सिखा दिया 
                                                                 
                            
मैंने उसे फूलों पे टहलना सिखा दिया 

मजदूर की गैरत का दिया कैसे बुझेगा 
जज्बात ने तूफान में जलना सिखा दिया 

रुतबा था जिस पहाड़ का आकाश की जद तक 
उसको गमों की आंच ने गलना सिखा दिया 

बच्चे को बड़ा देख कर बेवा को ये लगा 
उजड़े सोहाग से कोई मिलना सिखा दिया 

तंगी के नश्तरों ने जिगर फाड़ दिया था 
उम्मीद ने हर ज़ख्म को भरना सिखा दिया 

त्योहार पर बच्चे मेरे उपवास कर गये 
मैंने सभी को भूख से लड़ना सिखा दिया 

तन कर खड़ा था तन पे तने को गुमान था 
आंधी ने उस दरख़्त को हिलना सिखा दिया 

सब मिल के मेरी जड़ को सदा काटते रहे 
जिंदादिली ने फूलना फलना सिखा दिया 

जिनको मिली बुलंदियां मगरूर हो गये 
कमलेश को सूरज ने ढलना सिखा दिया 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।



 
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर