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रवीन्द्रनाथ ठाकुर: दिन पर दिन चले गए, पथ के किनारे

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दिन पर दिन चले गए,पथ के किनारे
गीतों पर गीत,अरे, रहता पसारे।।
बीतती नहीं बेला, सुर मैं उठाता
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता।।
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी 
जोह रहा बाट, अभी मिलना तो बाकी।।
चाहो क्या, रुकूँ नहीं, रहूँ सदा गाता 
करता जो प्रीत, अरे, व्यथा वही पाता।।


मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

11 घंटे पहले

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