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सरफ़राज़ आरिश की ग़ज़ल: अब तक जो जी चुका हूँ जनम गिन रहा हूँ मैं

आज का शब्द
                
                                                         
                            अब तक जो जी चुका हूँ जनम गिन रहा हूँ मैं
                                                                 
                            
दुनिया समझ रही है कि ग़म गिन रहा हूँ मैं

मतरूक रास्ते में लगा संग-ए-मील हूँ
भटके हुए के सीधे क़दम गिन रहा हूँ मैं

टेबल से गिर के रात को टूटा है इक गिलास
बत्ती जला के अपनी रक़म गिन रहा हूँ मैं

ता'दाद जानना है कि कितने मरे हैं आज
जो चल नहीं सके हैं वो बम गिन रहा हूँ मैं

उस की तरफ़ गया हूँ घड़ी देखता हुआ
अब वापसी पे अपने क़दम गिन रहा हूँ मैं

उँगली पे गिन रहा हूँ सभी दोस्तों के नाम
लेकिन तुम्हारे नाम पे अहद गिन रहा हूँ मैं

मैं संतरी हूँ 'औरतों की जेल का हुज़ूर
दो-चार क़ैदी इस लिए कम गिन रहा हूँ मैं

'आरिश' सुराही-दार सी गर्दन के सेहर में
ज़मज़म सी गुफ़्तुगू को भी रम गिन रहा हूँ मैं

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5 घंटे पहले

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