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श्रीकांत वर्मा: भटक गया हूं मैं अषाढ़ का पहला बादल !

कांत वर्मा: भटक गया हूं मैं अषाढ़ का पहला बादल !
                
                                                         
                            श्रीकांत वर्मा के पहले संग्रह- 'भटका मेघ' की कविताओं में ग्राम्य परिवेश के प्रति गहरा लगाव है। नदी, पहाड़, घाट, टीला, खंडहर, टिड़िया, आकाश, उषा, बादल, खेत, गुलाब, टेसू, बट, पीपल, सावन, लहर, झाड़ी-झुरमुट, इंद्रधनुष, आषाढ़ी बादल,फागुनी हवा आदि ग्रामीण प्रकृति के अनेक चित्र उनकी कविताओं में नज़र आते हैं- 
                                                                 
                            

भटक गया हूं 
मैं अषाढ़ का पहला बादल !
श्वेत फूल सी अलका की 
मैं पंखुरियां तक न छू सका हूं 
किसी शाप से शप्त हुआ 
दिग्भ्रमित हुआ हूं 
शताब्दियों के अंतराल में घुमड़ रहा हूं, घूम रहा हूं।
कालिदास ! मैं भटक गया हूं,
मोती के कमलों पर बैठी 
अलका का पथ भूल गया हूं 

मेरी पलकों में अलका के सपने जैसे डूब गये हैं 
मुझमें बिजली  बन आदेश तुम्हारा 
अब तक कड़क रहा है।
आंसू धुला रामगिरी काले हाथी जैसा मुझे याद है 
लेकिन मैं निरपेक्ष नहीं हूं 
मुझे मालवा के कछार से 
साथ उड़ाती हुई हवाएं 
कहां न जाने छोड़ गयी हैं !
अगर कहीं अलका बादल बन सकती 
मैं अलका बन सकता !
मुझे मालवा के कछार से 
साथ उड़ाती हुई हवाएं 
उज्जयिनी में पल भर जैसे 
ठिठक गयीं थीं, ठहर गयी थी 
क्षिप्रा की वह क्षीण धार छू 
सिहर गयी थीं 
मैंने अपने स्वागत में तब कितने हाथ जुड़ा पाये थे
मध्य मालवा, मध्य देश में 
कितने खेत पड़े पाये थे 
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एक वर्ष पहले

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