जहां ग़ालिब की शायरी आम लोगों को मुंह-ज़ुबानी याद हैं वहीं उस तरह से मीर की दख़लअंदाजी आवाम के बीच नहीं हो पाई लेकिन बावजूद इसके मीर तक़ी मीर को ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ कहा जाता है, यह वो ओहदा है जिसे ग़ालिब, दाग़, नज़ीर और इक़बाल कभी न पा सके। ग़ालिबन मीर की शाइरी और उनके काव्य से गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है।
जाते हैं दिन बहार के अबकी भी बाव से
दिल दाग़ हो रहा है चमन के सुभाव से
ज़ुबानों के इस ताल-मेल का एक ख़ास कारण यह भी है कि वर्तमान हिन्दी और उर्दू के निर्माण में अठारहवीं शताब्दी जो मीर की शताब्दी भी है, उसका एक बड़ा योगदान है। उस समय की भाषा उर्दू लिपि और शाइरी के रूप में निखर रही थी और निश्चित ही मीर ने उस में अपनी उस्तादी कायम कर ली।
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मुझको शाइर न कहो
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