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मीर अकेले ऐसे शाइर हैं जिन्हें ख़ुदा-ए-सु़ख़न कहा जाता है

Mir taqi mir only shayar called khuda e sukhan
                
                                                         
                            

जहां ग़ालिब की शायरी आम लोगों को मुंह-ज़ुबानी याद हैं वहीं उस तरह से मीर की दख़लअंदाजी आवाम के बीच नहीं हो पाई लेकिन बावजूद इसके मीर तक़ी मीर को ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ कहा जाता है, यह वो ओहदा है जिसे ग़ालिब, दाग़, नज़ीर और इक़बाल कभी न पा सके। ग़ालिबन मीर की शाइरी और उनके काव्य से गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है।

जाते हैं दिन बहार के अबकी भी बाव से
दिल दाग़ हो रहा है चमन के सुभाव से


ज़ुबानों के इस ताल-मेल का एक ख़ास कारण यह भी है कि वर्तमान हिन्दी और उर्दू के निर्माण में अठारहवीं शताब्दी जो मीर की शताब्दी भी है, उसका एक बड़ा योगदान है। उस समय की भाषा उर्दू लिपि और शाइरी के रूप में निखर रही थी और निश्चित ही मीर ने उस में अपनी उस्तादी कायम कर ली।

मुझको शाइर न कहो

अपनी शाइरी को दर्द और ग़म का मज़मूआ बताते हुए मीर ने कहा है कि मेरी शायरी ख़ास लोगों की पसंद की ज़रूर है लेकिन मेरी गुफ्तगू अवाम से है।

मुझको शाइर न कहो मीर कि साहब मैंने
दर्द-ओ-ग़म कितने किए जमा, सो दीवान किया

राजकमल प्रकाशन की से प्रकाशित किताब ‘दीवान-ए-मीर’ में अली सरदार जाफ़री की लिखी भूमिका मीर पर लिखी महत्वपूर्ण टीकाओं में से एक है, वहां ज़िक्र है कि 1947 के समय में जब हिंदु-मुस्लिम-सिख दंगे और कत्ले-आम हुआ तो लोगों ने बाकी सब शायरों का दामन छोड़कर मीर की शरण ली।
यहां एक ख़ास बात यह भी है कि जिस संजीदगी से मीर ने उन लोगों को छुआ जो दंगों में घिरे थे, तो उतनी ही सादगी से मुहब्बत करने वालों को भी स्पर्श किया।

मेरी दिल क्यों न जाए उस गली में
गली उस दिलरुबा की दिलकुशा है
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मुझको शाइर न कहो

7 वर्ष पहले

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