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मुनीर की शायरी मन के अंदर के तारों को खोलती है

मुनीर नियाजी
                
                                                         
                            मुनीर के अकेलेपन को समझते-समझते आप अकेले हो जाओगे। उनके अकेलेपन के नए अंदाज को समझने का लोगों में धैर्य नहीं था और इस तरह मुनीर को लोग 'अजनबी' समझ बैठे। मैंने मुनीर को जितना पढ़ा है उसके बाद मैं उन्हें 'अजनबी' नहीं बल्कि चाह के बगैर गहरे एहसास में डूबे रहने वाला शायर मानता हूं। मुनीर की शायरी मेरे मन के अंदर के तारों को खोलती है। मुझे उनका अजनबीपन अच्छा लगा। 
                                                                 
                            
 

मुनीर का अकेलापन उनकी नज्मों में साफ देखा जा सकता है। समय की धड़कनों के इस शायर की कुछ गजलें तो दर्शन का गहरा एहसास अपने में समेटे हुए है।  

इतने खामोश भी रहा न करो 
गम जुदाई में यूं किया न करो 

ख्वाब होते हैं देखने के लिए 
उनमें जा कर मगर रहा न करो 

कुछ न होगा गिला भी करने से 
जालिमों से गिला किया न करो 

उन से निकलें हिकायतें शायद
हर्फ लिख कर मिटा दिया न करो 

अपने रुत्बे का कुछ लिहाज मुनीर 
यार सब को बना लिया न करो 
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3 वर्ष पहले

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