ऐ दिल! तन्हाई का बड़ा सहारा है!
सिवा इस के और कौन हमारा है??
जब कभी इस दिल पे चोट खाई हम ने!
तड़प के अपने-आप को पुकारा है!!
तुम तो चली गई ख़ुदा हाफ़िज़ कह के!
मेरा दिल उसी दिन से बे-सहारा है!!
तेरे बा'द फिर कोई जॅंचा ही नहीं!
मेरी नज़रों में चुभता हर नज़ारा है!!
तू जहाॅं भी रहे शाद-ओ-आबाद रहे!
तेरी उदासी हमें कब गवारा है!!
डूबना मेरा मुक़द्दर है 'परवेज़'!
मेरी ऑंखों के सामने किनारा है!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
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