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                            मन रूपी माया में फंसी जानकी
                                                                 
                            
स्वर्ण मृग देख ललचाई ।
जिनकी प्रकृति ही है चंचला
वो कहां माया समझ पाई।।
विवेक के प्रतीक हैं राम
सीता को माया समझ न आई।
स्वर्ण मृग होते नहीं सीते
माया के आगे विवेक हार लगाई।।
लक्ष्मण को सौंप जनकसुता
धनुष बाण ले भागे राम।
मृग मारीच को बांधने
जो है लोभ का प्रमाण।।
"हे सीते"गूंजा अरण्य में
अनिष्ट आशंका उपजा मन में।
धैर्य को भेजा विवेक ढूंढने
भू- सूता घिर चुकी मन के रण में।।
लक्ष्मण रेखा है मर्यादा रेखा
जिसे पार कर गई सीता।
भेष बदल आया रावण
अहंकार हर ले गया मन को।।
ज्ञान है अहंकार की जननी
रावण जिसका प्रतीक है।
जो तोड़ते अपनी मर्यादा
उनका हरण निश्चित है।।
हममें ही राम हैं
हममें ही है सीते ।
हमहीं अपने अंतस
सारे किरदार हैं जीते।।
मन है सीता
विवेक हैं राम
धैर्य है लक्ष्मण
रावण अहंकार का प्रमाण।।
-अभिषेक राय 
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