क्रोध का करो विरोध , इससे नही होता है प्रतिशोध
गुस्से मे कई लोग घुस जाते है , बाहर कभी नही निकल पाते हैं
उसके बाद बहुत पचताते है, वे अपने घर भी नहीं आ पाते है
माँ बाप रोते रोते रह जाते है , अपने बच्चे को जब खोता पाते है
ठीक से सो भी नहीं पाते है, करवट लेते रहते है
दुनिया मे होते हुए भी मौत को गले लगाते है , जब अपने लाडले को आंगन में शिथिल पड़ा पाते है
वो आंगन जिसमे वो खेला करता था, वो आंगन जिसमे वो घुमा करता था
वो डाली जिसपर उसका झूला था , वो काली जिसपर वो रोता था
वो बहन जिससे वो लड़ता था, वो भाई जिसपर वो मरता था
आंगन आज सूना क्यों, डाली आज रूठी क्यों
काली आज झूठी क्यों , बहन आज चुप क्यों , भाई आज लुप्त क्यों
माँ की एक आंख फूटी , पिता की एक बाजू टूटी
चुल्हा न जल पाया , पेट न भर पाया
तूने बहुत है तड़पाया, उसको न मिली तेरी छाया जिसपर उसका हक था
तेरे अंश को तेरे पर क्यो शक था , इसलिेए कहता हूं क्रोध का करो विरोध इससे नही होता है प प्रतिशोध
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