निकल चुका हूँ अब उस भ्रम से कि कोई मुझे समझेगा,
इस दुनिया में हर रिश्ता बस अपने हित तक ही मिला।
बहुत खोजा अपनापन मैंने लोगों के दिलों में,
पर हर चेहरा अपनी चाहत और ज़रूरतों में ही उलझा मिला।
मेरे मन की पीड़ा को किसने सच में जाना है,
हर कोई अपनी ही कहानी में खोया मिला।
साथ निभाने की बातें तो सबने बड़े मन से कीं,
पर कठिन समय आते ही हर रास्ता सूना मिला।
अब न कोई शिकायत है और न कोई अपेक्षा,
जो जैसा है, वैसा ही इस जग में दिखता मिला।
- डी. के. कनौजिया
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