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कविता: विश्वास का मूल्य

                
                                                         
                            ईश्वर की शरण में जाना सरल है,
                                                                 
                            
माथा टेकना भी सहज ही कर्म है,
पर जो अपने ही दिल को छल जाए,
उसका हर भक्ति-पथ भी व्यर्थ है।

मंदिर की घंटियों में गूंजे स्वर,
मस्जिद में उठे दुआओं का शोर,
पर अंतर्मन जब हो कपट से भरा,
तो कैसी पूजा, कैसा ही जोर।

विभीषण ने छोड़ा था अपना घर,
सत्य का साथ निभाने को,
पर आज के विभीषण बदल गए,
स्वार्थ के दीप जलाने को।

रिश्तों की नींव भरोसे पर है,
झूठ से वह टिकती नहीं,
अपने ही जब पीठ में वार करें,
तो आस्था फिर बचती नहीं।

ईश्वर भी देखे मन की सच्चाई,
केवल वचन से होता क्या है,
जो अपनों का विश्वास तोड़ दे,
वह भक्त नहीं बस धोखा है।
- डी के कनौजिया
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3 दिन पहले

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