आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

" मेरी मौत "

                
                                                         
                            हर शख्स उस दिन पसंद करेगा मुझको ,
                                                                 
                            
सर आँखों पर धरेगा मुझको ,
जिस दिन स्वर्ग सिधार जाऊँगा मैं, और चार कंधो पर आ जाऊँगा मैं।

साँस निकलते ही पलंग से उतार दिया जाऊँगा ,
जैसे 'बासी' हो कई बरसों से, ऐसे नहलाया जाऊँगा ,
'बाँस' के 'घास फूस' के बिस्तर पर लिटा कर मुझको ,
किसी के द्वारा लाया गया शव वस्त्र ओढ़ाया जाएगा ,
एक के ऊपर एक कफन डालकर मुझे दबाया जाएगा ।बाँधा जाएगा जूट की रस्सियों से , कि कही चलते-चलते गिर ना जाऊँ मैं ,
कील ठोक दी जाएगी दहलीज पर , कही फिर से वापस ना आ जाऊँ मैं ।

और........
फिर कह राम-राम , कह राम-राम , कह राम यात्रा निकाली जाएगी ,
कुछ भी कमाया हो जीवन में मगर झोली खाली जाएगी ,
किसी-किसी के द्वारा अर्थी को कंधे लगाए जाएँगे,
राम-नाम ही सच है , झूठ के नारे लगाए जाएँगे ।

किच-किच की आवाज अर्थी से लगातार सुनाई देगी ,
पीछे कुछ देर अपनों की चीखें सुनाई देगी ,
पिछली सारी 'पीढ़ी' मुझको साफ दिखाई देगी ,
मुझको अपनी मंजिल अब उस पार दिखायी देगी ।

शमशान से थोड़ा पहले मुझको सड़क के एक तरफ लगाया जाएगा ,
एक आटे की लोई को पैरों तले दबाया जाएगा ।

और फिर.....
फिर ले चलेंगे मुझको शमशान की ओर,
मेरे अंतिम मुकाम की ओर,
ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं कि मुझको, कोई कर्म कमाना हो,
अंतिम इच्छा यही है कि मेरा शमशान 'इसराना' हो।

शमशान पहुँचने से पहले पलंग तैयार हो चुका होगा,
हर शख्स अपने हिस्से की लकड़ियाँ ढो चुका होगा।
लेटा देंगे मुझे चिता पर, सामग्री और घी से मेरा श्रृंगार करेंगे,
जो सबसे भारी लकड़ी होगा, वो मेरी छाती पर धरेंगे।
घूम-घूम कर चारों ओर, पानी का बाँध बनाया जाएगा,
कोई कमी न रह जाए मेरे जलने में, तो घास-फूस लगाया जाएगा।

दे देंगे 'मुखाग्नि' मुझको, धूँ-धूँ कर के जल जाऊँगा,
किसी को चीख-पुकार ना सुनेगी, चाहे जितना भी चिल्लाऊँगा।

हाय ! तुम तो मेरे अपने थे ... ये कैसा अब ज़ुल्म किया,
एक साँस ही तुम्हारी थी क्या ? जो निकलते ही मुझको अलग किया?
आग की लपटें चीखों को दबाती जाएँगी,
पहले त्वचा जलेगी, फिर अंग-अंग, फिर हड्डियों को राख बनाएँगी।

चले जाएँगे सब मुझको अकेला छोड़कर,
एक बाँस मेरे ऊपर से फेंककर और मुझसे नाता तोड़कर...

"कोई पलट कर ना देखेगा, कि कौन था -- मैं ?"
"मेरी मौत पर सब रोए, अपनी ही मौत पर मौन था मैं।"
-आलोक शर्मा 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
54 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर