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साक़ी फ़ारुक़ी: मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

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मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा
ये हादिसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा

मैं रक़्स करता रहा सारी उम्र वहशत में
हज़ार हल्क़ा-ए-ज़ंजीर बाम-ओ-दर में रहा

तिरे फ़िराक़ की क़ीमत हमारे पास न थी
तिरे विसाल का सौदा हमारे सर में रहा

ये आग साथ न होती तो राख हो जाते
अजीब रंग तिरे नाम से हुनर में रहा

अब एक वादी-ए-निस्याँ में छुपता जाता है
वो एक साया कि यादों की रहगुज़र में रहा

एक दिन पहले

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