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रहमान फ़ारिस: यार खो जाए तो फिर कौन सा डर बचता है

rehman faaris famous ghazal jab khizan aaye toh patte na samar bachta hai
                
                                                         
                            
जब ख़िज़ाँ आए तो पत्ते न समर बचता है
ख़ाली झोली लिए वीरान शजर बचता है

नुक्ता-चीं शौक़ से दिन रात मिरे 'ऐब निकाल
क्यूँकि जब 'ऐब निकल जाएँ हुनर बचता है

सारे डर बस इसी डर से हैं कि खो जाए न यार
यार खो जाए तो फिर कौन सा डर बचता है

रोज़ पथराव बहुत करते हैं दुनिया वाले
रोज़ मर मर के मिरा ख़्वाब-नगर बचता है

ग़म वो रस्ता है कि शब भर उसे तय करने के बाद
सुब्ह-दम देखें तो उतना ही सफ़र बचता है

बस यही सोच के आया हूँ तिरी चौखट पर
दर-ब-दर होने के बा'द इक यही दर बचता है

अब मरे 'ऐब ज़दा शहर के शर से साहिब
शाज़-ओ-नादिर ही कोई अहल-ए-हुनर बचता है

'इश्क़ वो 'इल्म-ए-रियाज़ी है कि जिस में फ़ारिस
दो से जब एक निकालें तो सिफ़र बचता है
एक दिन पहले

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