"अश्कों का समंदर"
"मेरे जीवन में तुम्हारे होने से
कभी नमक भी मीठा लगता था,
अब यह मिश्री भी खट्टी सी लगती है।
गुजरा जो सावन, वह पतझड़ सा था।
मिलते थे हम रोज़, मगर हर मुलाकात का
आलम मन पर छाया रहता था।
तू समेट कर ले गई सारे वादे,
अब हर शाम आँखों में अश्कों का समंदर है।
तुमने वक्त गुजारा हो फुर्सत में,
हमने जिंदगी लुटाई थी तुझ पर।
बिना कहे ही रिहा हो गई तुम इस बंधन से,
मेरी मुस्कुराहट उधार है तुझ पर।
उम्रभर खर्च हुई अहमियत, एहसास, वक्त...
मैं शख्स ही परवाना था।
अब तेरे हिस्से का वक्त गुज़रता नहीं,
मैंने वक्त औरों को दिया ही कब था!"
-अमोल हरिदास
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