आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं महरोई का जंगल

                
                                                         
                            हम भी कभी हरे- भरे थे,बसंत संग झूमते -गाते थे,
                                                                 
                            
पंछियों के आशियाने थे,हम भी हंसते-मुस्कुराते थे।

अब,सलिल के हृदय पर खड़े, हम मौन पड़े पहरेदार हैं,
थे कभी आसमां पर, अब बस पुरानी यादों के म़जार है।

न पल्लव की शरारत है , ना परिंदों का वो बसेरा,
बस इक ठहरी झील है, और अतीत का गहरा अंधेरा।

हमारी नंगी टहनियां, बहारों से कुछ पूछती हैं,
पर वो बीती हुई बहारें, बस ख्यालों में ही गूंजती हैं।

जड़ें सलिल में डूबी हैं, पर प्यास फिर भी बाॅंकी है,
इन सुनसान नजारों में, कुदरत की बस इक झाॅंकी हैं।

शहडोल की इस माटी में हम, गड़े हुए इतिहास है,
बेजान होकर भी मगर हम, जीने का इक एहसास हैं।

ना हमें बिखरने की चाह है, न सुंदर संवरने की आस है,
इस ठहरे नीले झील में , हमारा अपना ही आकाश हैं।

सब ने हमको धिक्कारा है ,स्वयं को हम स्वीकार है,
उजड़े-बिखरे तो क्या हुआ? हमारा अपना ही संसार है।
- अनामिकाज्ञानशंकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर