संकीर्णता में चल नहीं सकता धरती का विधान,
एक ईश्वर को बाँट-बाँट कर चल रहा इंसान।।
कौन कहता है अल्लाह-ईश्वर दो अलग भगवान हैं,
ईश्वर तो एक ही है, बस मन में बैठे भ्रम और शैतान हैं।।
सूरज सबको रोशनी देता, चाँद सभी पर मुस्काता है,
नदियों का जल बिना भेदभाव के हर प्यास बुझाता है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब उसकी संतान हैं,
फिर क्यों नफरत की दीवारें खड़ी करे इंसान है।।
मंदिर में जो दीप जले, वही नूर मस्जिद में है,
गुरुद्वारे की सेवा में भी वही प्रेम हर दिल में है।
गिरजाघर की प्रार्थना में भी उसकी ही पहचान है,
नाम भले ही अलग-अलग हों, मालिक एक महान है।।
धर्म नहीं सिखलाता हमको आपस में वैर बढ़ाना,
धर्म का सच्चा अर्थ है सबको गले लगाना।
जो मानव से प्रेम करे, वही सच्चा धर्म निभाता है,
दीन-दुखियों की सेवा करके ईश्वर को पा जाता है।।
लालच, घृणा, अहंकारों ने मानव को भटकाया है,
जाति-पंथ के झगड़ों में अपना ही घर जलाया है।
प्रेम, दया और करुणा से ही जीवन का उत्थान है,
इन्हीं गुणों से महक उठता सारा हिंदुस्तान है।।
आओ मिलकर प्रण कर लें, नफरत को दूर भगाएँगे,
मानवता के पावन पथ पर सबको साथ चलाएँगे।
एक धरा है, एक गगन है, एक ही उसकी शान,
संकीर्णता में चल नहीं सकता धरती का विधान।।
एक ईश्वर को बाँट-बाँट कर चल रहा इंसान,
प्रेम ही सच्चा धर्म अनिल, यही संतों का ज्ञान।।
-अनिल सोनी
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