तारों के गाँव में...
चलो—
आज रात
सपनों की गठरी बाँधकर
तारों के गाँव चलते हैं।
जहाँ चाँद
किसी बूढ़े ऋषि-सा
मौन में उजाला लिखता है,
और हर तारा
अपने छोटे-से जीवन में
एक अनंत आकाश सँजोए रहता है।
वहाँ
न कोई ईर्ष्या होगी,
न कोई शोर,
केवल कल्पनाओं की पगडंडियाँ होंगी
और शब्दों की निर्मल नदी।
हम चुनेंगे
कुछ टूटे हुए सितारे,
उन्हें कविता के पन्नों पर रोप देंगे,
ताकि अँधेरे समय में भी
किसी पाठक की आँखों में
एक दीप जल सके।
हम चाँदनी से
स्याही बनाएँगे,
और आकाश को
एक खुली पुस्तक की तरह पढ़ेंगे,
जहाँ हर नक्षत्र
एक अधूरी कविता होगा।
तब समझ आएगा—
साहित्य
धरती पर नहीं जन्मता,
वह पहले
मन के आकाश में चमकता है,
फिर
किसी कवि की आँखों से उतरकर
शब्द बनता है।
आओ,
आज की रात
नींद से नहीं,
स्वप्न से दोस्ती करें—
क्योंकि
साहित्य की सबसे उजली राह
अक्सर तारों के गाँव से होकर ही गुजरती है।
- अनिता चतुर्वेदी
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