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रवींद्र कालिया: पेड़ नशे में झूमने लगा और बियर की ख़ाली बोतलें मुंह चिढ़ा रही थीं

Ghalib Chhuti Sharab: ravindra kalia drank sharab at public place
                
                                                         
                            
पेड़ नशे में झूमने लगा और बियर की ख़ाली बोतलें मुंह चिढ़ा रही थीं। रवींद्र कालिया की यह हालत तब हुई जब वह लेखक जगदीश चतुर्वेदी के साथ बियर पी रहे थे। संस्मरण 'ग़ालिब छुटी शराब' में रवींद्र कालिया इसका उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि वास्तव में शराब और कै़ (वॉमिटिंग) का चोली दामन का साथ है। कै़ के अनेक रूप होते हैं। चाहते या न चाहते हुए भी पीने वालों को अनायास ही उसका दीदार हो जाता है। सबसे खूबसूरत कै़ वह जो 'स्पांटेनियस ओवरफ्लो' की तरह निःसृत होती है। इसे स्वतःस्फूर्त कै़ की संज्ञा दी जा सकती है। 

कई शराबी इस तरह से कै़ करते हैं जैसे उन्हें हैज़ा हो गया हो। यानी वे थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद कै़ करते हैं। सबसे बुरी कै़ तो वह होती है जिसमें शराबी को इतना होश न रहे कि वह कै़ में इस प्रकार लथपथ हो रहा है जैसे सुअर गंदे नाले में। हो सकता है कै़ के कुछ प्रकार भी हों, मगर मेरा अनुभव मोटे तौर पर यही है। लोग तो शराब पीकर कै़ करते हैं मैंने तो अपने शराबी जीवन के प्रारंभिक दौर में बियर पीकर ही कै़ कर दी थी। सन बासठ-तिरसठ की बात है। वाक़या दिल्ली का है। 

उन दिनों केंद्रीय हिंदी निदेशालय का नया-नया गठन हुआ था। गठन तो हो चुका था, अब विस्तार हो रहा था। जिस रफ़्तार से भर्ती हो रही थी, दफ़्तर में काम उतना नहीं था। हम लोग काम की प्रतीक्षा कुछ इस प्रकार करते थे, जैसे वेश्याएं ग्राहक की प्रतीक्षा करती हैं। हफ्तों कोई काम नहीं होता था। कहानी लिखने का सही चस्का मुझे उसी कार्यालय में लगा। चतुर्वेदी जीनियस था, मगर भटका हुआ। दफ़्तर में बैठे-बैठे वह दिनभर में दर्जनों कविताएं लिख देता। उन दिनों दिल्ली में बेकार लेखकों की अच्छी-ख़ासी फ़ौज थी।

जेठ की तपती दोपहरी में एक दिन किसी पत्रिका से मेरा और जगदीश चतुर्वेदी का मनीऑर्डर से एक साथ पारिश्रमिक आ गया। हम लोगों की जेबें हमेशा की तरह ख़ाली थीं और लिखने-पढ़ने में भी मन न लग रहा था। पैसा मिलते ही दोनों की जड़ता टूटी। 'बियर पिए एक युग हो गया है।' जगदीश चतुर्वेदी ने सहसा सुझाया, 'चलो आज दफ़्तर के बाद बियर पी जाए।'

'मगर कहां?' मैंने पूछा। उन दिनों बियर तो बाज़ार में उपलब्ध थी, मगर सार्वजनिक स्थान पर पीने पर प्रतिबंध था। हम लोग शाम भी कनाट प्लेस में बिताना चाहते थे। घर जाकर लौटना संभव नहीं था। जगदीश ने सुझाया कि रीगल से बियर लेते हैं और टी-हाउस के पीछे हनुमान लेन के मैदान में पेड़ की छाया में पी लेगें।

'गिलास कहां से आएंगे?'
'गिलास में कौन पीता है। बोतल खोलेंगे और पी जाएंगे।'

मेरा सड़क पर पीने का कोई अनुभव नहीं था। कोई सुरक्षित ठिकाना भी मालूम नहीं था। आए दिन समाचार पत्रों में इस प्रकार के समाचार भी पढ़ने को मिल जाते थे कि सार्वजनिक स्थान पर मदिरापान करते हुए इतने आदमी हिरासत में लिए गए। 

दफ़्तर के बाद हम लोगों ने इसी योजना के अधीन रीगल से बियर की दो बोतलें ख़रीद लीं, ओपनर उन दिनों मुफ़्त मिल जाता था। हम लोग हनुमान लेन की ओर चल दिए। हनुमान लेन पर उतना सन्नाटा नहीं था, जितना जगदीश समझता था। उन दिनों बलवंत गार्गी भी कनाट प्लेस की किसी लेन में रहते थे।

अपने पंजाबी और उर्दू के दोस्तों के साथ कई बार उनके घर का इस्तेमाल 'बार' की तरह किया था, मगर मैं अकेला कभी नहीं गया था। बहरहाल अपेक्षाकृत एक सुनसान जगह पर पेड़ की आड़ में हम लोगों ने बोतलें खोलीं। गाढ़ी कमाई की एक भी बूंद नष्ट हो इससे पहले हम लोग शंख की तरह मुंह में बोतलें लगाकर गटागट पी गए। हम लोगों से ज़्यादा बियर हमारे भीतर जाने को उतावली हो रही थी। हम लोग जब तक सांस रोक सकते थे, लंबे-लंबे घूंट भरते रहे। लग रहा था अभी कोई सिपाही पीछे से कंधों पर धौल जमा देगा। डर के मारे चार छह सांस में ही आधी-आधी बोतल गटक गए। इसके बाद चारों ओर नज़र घुमाकर जायज़ा लिया और ज़्यादा से ज़्यादा बियर पेट में भर ली। 

'जानते हो हम लोग सरकारी कर्मचारी हैं। पकड़े गए तो नौकरी भी जा सकती है।' जगदीश ने कहा और दोबारा यही एक्सरसाइज़ शुरू कर दी। उसकी आंखें बाहर निकल आई थीं। यही हालत मेरी थी। पेट फूलकर कुप्पा हो गया था। ख़ाली बोतलें हम जितनी दूर फेंक सकते थे फेंक दीं। दूर-दूर तक किसी सिपाही का नामोनिशान नहीं था। हम लोग वहां से हटते कि दोनों के मुंह से पिचकारी की तरह बियर का फव्वारा फूट निकला। एक तरफ़ मैं और दूसरी तरफ़ जगदीश बियर से पेड़ की सिंचाई करने लगे। हम लोगों ने जितनी जल्दबाज़ी में बियर पी थी, उससे कहीं अधिक वेग से वह बाहर निकल रही थी स्वतःस्फूर्त कविता की तरह। पेड़ नशे में झूमने लगा और हम आंख, नाक, मुंह पोंछते हुए वहीं पास के एक बेंच पर बैठकर सुस्ताने लगे। कुछ ही फासले पर बियर की ख़ाली बोतलें पड़ी थीं और हमें मुंह चिढ़ा रही थीं।

(रवींद्र कालिया की किताब ग़ालिब छुटी शराब का अंश) 
5 महीने पहले

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