अंतस मन से कोलाहल तक,
मैंने सिर्फ़ तुझे ही चाहा है।
हर धड़कन की ख़ामोशी में,
तेरा ही नाम सराहा है।
तू किसी और की दुनिया में,
अपनी खुशियों का दीप जला लेना।
मैं अपनी तन्हा रातों में,
यादों का एक नगर बसा लूँगा।
तेरे हर उत्सव की ख़ातिर,
अपने अश्कों को भी हँसा दूँगा।
प्रेम अगर सच में पावन है,
तो बंधन उसका तन से नहीं।
जिसे रूह ने अपना मान लिया,
वो बिछड़कर भी बिछड़ता नहीं।
मेरे हिस्से की हर बेचैनी,
तेरे हिस्से का सुकून बने।
मेरी सारी अधूरी साँसें,
तेरे जीवन का जुनून बने।
जब-जब चाँद गगन में निकले,
मेरा हाल उसे सुनाते जाना।
यदि मेरी याद कभी आ जाए,
बस मुस्काकर आगे बढ़ जाना।
मैंने प्रेम किया है तुमसे,
कोई अधिकार जताया नहीं।
तेरी राह में फूल ही माँगे,
काँटा कभी नहीं बिछाया है
अंतस मन से कोलाहल तक,
मैंने सिर्फ़ तुझे ही चाहा है।
-रविकुमार खोब्रागड़े
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