जेब में दो टॉफियाँ होती थीं,
और लगता था
दुनिया की सबसे बड़ी दौलत
हमारे पास है।
पापा के स्कूटर पर बैठकर
बाज़ार तक जाना,
किसी परियों की कहानी के
उड़नखटोले से कम नहीं लगता था।
रास्ते भर
हवा बाल उलझा देती थी,
और हम समझते थे,
पूरा शहर
हमारे साथ दौड़ रहा है।
साबुन के झाग से
हम बादल बना लेते थे,
और हथेलियों पर टिके
उन छोटे-छोटे बुलबुलों में
अपना आसमान देख लेते थे।
रसना वाली लड़की जैसी
फाउंटेन-सी चोटी,
घुटनों तक आती फ्रॉक,
और बाहर झाँकती बनियान...
तब इन बातों पर
किसी का ध्यान ही कहाँ जाता था।
शाम ढलने तक
घर लौटने की कोई जल्दी नहीं होती थी।
न कल की चिंता,
न आने वाले समय का डर।
बस उस दिन की मस्ती ही
हमारी पूरी दुनिया होती थी।
माँ की गोद,
बाबा का कंधा,
और पापा की उंगली पकड़कर चलना...
यही हमारी
सबसे सुरक्षित जगह थी।
कभी
अपने घर की रियासत के
राजा या रानी बन जाते थे।
तो कभी
लाल कपड़ा बाँधकर
सुपरमैन बनने की कोशिश करते थे।
उस समय
सपनाें की कोई कीमत नहीं होती थी,
क्योंकि हर सपना
सच लगने लगता था।
फिर धीरे-धीरे
स्कूल की किताबों के साथ
ज़िम्मेदारियाँ भी बड़ी होने लगीं।
जेब में अब टॉफियों की जगह
ज़रूरतों की सूची रहने लगी।
और बाज़ार में
खिलौनों से ज़्यादा
कीमतों पर नज़र जाने लगी।
आज भी
उसी बाज़ार से गुज़रता हूँ,
दुकानें वही हैं,
रास्ते वही हैं,
पर न जाने क्यों
वह उड़नखटोला
अब दिखाई नहीं देता।
शायद...
बचपन कहीं गया नहीं,
वह आज भी
साबुन के झाग में,
रसना वाली उस फाउंटेन चोटी में,
पापा के स्कूटर की पिछली सीट पर,
और माँ की गोद की गरमाहट में
वैसा ही बैठा है।
बदल तो बस
हम गए हैं।
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