मैंने वही किया जो मुझे करना था,
लोगों की बातों से बहुत आगे निकलना था।
अपना पक्ष रखना था,
दिल के उजालों में जलना था,
रात की चाँदनी में निखरना था।
अपने अंतर्मन को पढ़,
स्वयं की इच्छाओं को आगे रख…
खुद की मुस्कान को संभालना था,
अपने आप को एक नई “मैं” से मिलाना था।
गिरना था, उठना था,
अपने आप ही निखरना था।
अपनी महत्वाकांक्षाओं की
ऊँची उड़ान को भरना था।
बस स्वतः की इच्छाओं का सम्मान
और स्वयं की पहचान करना था।
अपने लिए खड़े होना,
औरों के लिए प्रेरणा बन जाना…
अपनी राह खुद ही बनाना,
और भीड़ में होकर भी,
भीड़ से अलग नज़र आना।
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