तुम बिन सारे मौसम अधूरे हैं,
तुम बिन उजालों में भी अँधेरा है,
तुम बिन खुशियों में भी मायूसी है,
तुम बिन शीतलता में भी कड़ी धूप है,
तुम बिन दिल भी शांत है,
तुम बिन बातें भी मंद हैं,
क्या ये मेरे प्यार जताने का तरीका है या फिर तुम्हारा बड़प्पन ?
क्या ये मेरे दिल की बात है या फिर तुम्हारी आदत है?
खैर, लिखने को बहुत कुछ है, तुम्हारे ऊपर तो मैं क्या किताब लिख दूँ?
अगर किताब लिख भी दूँ तो क्या, तुम उसे पढ़ पाओगी...?
और अगर पढ़ भी ली तो क्या, मुस्कराओगी...?
क्योंकि इस किताब के पीछे बस तुम्हारी मुस्कुराहट देखना है।
माँ ।।
-अर्पिता
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