हलक तक डूबा रिश्वत के दलदल में ऐ महकमा सरकारी है,
सब झूठ के पुलिंदों में बंधी फाइलें अफसरों की कारगुजारी है,
जद्दोजहद जिंदगी की हर आदमी पिस रहा सिस्टम की चक्की में,
हर दौर में बस लड़ते रहना यहां इंसानों की लाचारी है,
सबके जीवन में बस वही बेबसी-मायूसी आंखों में आंसू,
जीवन की खुशियों में हर वक्त अंदेशा उदासी का पहरा,
सब सोच में डूबे हैं ऐ अपनी या ऊपरवाले की मर्जी है,
कर लेते हैं समझौता सोचकर यही सब किस्मत की मर्जी है,
नींदों में जगते रहते हैं सब आंखों में सपने हैं लेकिन,
हर जीवन में उम्मीदों की हरपल बुझती जाती चिंगारी है।
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