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हर राह अच्छी

                
                                                         
                            चल रहा है मुसाफ़िर,प्रश्न लिए ये मन में,
                                                                 
                            
अनजानी सी ये राह किधर को जायेगी ।

न जाने कोई पग बढ़ा था इन राहों पर,
या यूं भटकन मन की मुझे तड़पाएगी।

अंधकार यूं ही मिलता रहा जो जीवन में,
क्या सविता की अंशुमा धरा जगमगाएगी?

कब तक यूं करूं इंतज़ार मै दिवाकर का,
क्या मेरे अन्तस की ज्योति ज्ञान जगाएगी?

दोष कब रहा राह का मनुज के जीवन में,
वही राह विरलों को ही भास्कर बनाएगी।

सद्ज्ञान का उदय हो जो जीवन में ,वैदेही,
हर राह ही आनंद कका नव दीप जलाएगी।

लक्ष्य देता वह जीवनदाता ही हमें जीवन में,
हर राह ही धरा पर,नव पुष्प ही खिलाएगी।

मत हो उदास रे मनुज,जीवन की नव राहों से,
हर राह ही तुझे,एक सशक्ता का पाठ सिखाएगी।
-अरुणिमा बहादुर खरे ' वैदेही '
 
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2 घंटे पहले

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